यात्रा……. कैलाश मानसरोव PART: 2

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  “हर हर महादेव  बम बम भोले” इन उदघोषों के साथ हम 6 दिनों की अविस्मरणीय यात्रा  के लिए एक अपरिचित लेकिन बहू प्रतीक्षित मार्ग पर बढ़ चले।सभी सह यात्री 2 बसों में आराम सेखिड़की से बाहर उच्च हिमालय के विशाल परन्तु मनोरम घाटियों को निहारते तीव्र ढलानों पर इ तरह  नीचे की तरफ बढ़ रहे थे जैसे हम बस में नहीं अपितु हवा के कोमल गद्दों पर सवार थे।दूर दूर ,चारों तरफ हरियाली की चादर फेली हुई थी। 

       करीब 3 घंटो की यात्रा के बाद हर भरे खूबसूरत पहाड़ों के मध्य एक बड़े से शहर में हमारी बसों ने प्रवेश किया। जब हमने बस के अंदर मोजूद गाइड से इस शहर का नाम पूछा तो हमें एकनई कठिनाई का सामना करना पड़ा ।गाइड से जब बात करने की कोशिश की तो पता चला कि उसका भाषा ज्ञान केवल चीनी भाषा तक ही सीमित था।बहुत जोर देने, समझाने के बाद हमें केवल इतना ही समझ आया कि इस शहर का नाम टोंबो है।यहां मै अपने पाठकों को यह बताना चाहूंगाकि आगे आने शहरों से, जहां हमारी बस, यात्रा के दौरान गुजरी थी ,उन सबके नाम चीनी भाषा में होने के कारण इतने अजीब थे कि हम भी उनको ना तो हिंदी या अंग्रेजी में बोल सकते है और ना ही लिख सकते हैं,इसलिए इस यात्रा वर्णन में ,हम उनका नाम, प्रतीक शब्दों में ही लिखेंगे।

       हमारी बसें जिस होटल के सामने रुकी,उसके मुख्य गेट के ऊपर ही एक कपड़े का बोर्ड टंगा था जिसपर चीनी भाषा में ही कुछ लिखा था।हम सब यात्रियों ने यही माना कि शायद उस पर हमारी कैलाश मानसरोवर के यात्रियों के स्वागत में ही कुछ लिखा होगा।सब यात्री बसों से उतर कर होटल के अंदर प्रवेश कर गए।होटल काफी बड़ा और आधुनिक था।अंदर एक बडा हाल था जिसमें खूबसूरत डेकोरेशन के साथ काफी अधिक संख्या में कुर्सी मेज लगी हुई थी।हाल के एक दम किनारे शीशे की बड़ी दीवार थी जिसके एकदम बगल में एक तीव्र जल धारा के साथ ऊपर पहाड़ों से उतरती नदी बह रही थी।उसके दूसरे किनारे पर हरियाली से भरपूर जंगल दिखाई दे रहा था।यह सारा दृश्य एकअद्भुत और मनभावन था।अधिकांश यात्रियों ने इस शीशे की दीवार के समीप लगी मेज कुर्सियों पर ही स्थान ग्रहण कर लिया था।उन सबकी नजर तो बगल मे बहती जल धारा पर थी मगर मेरी नजर होटल की खूबसूरत वास्तुकला पर और कर्मचारियों पर थी।सारे कर्मचारी मनमोहक वर्दी में सजे नम्रता से झुके नजर आ रहे थे,मगर यहां भी वही भाषा की कठिनाई।हमारे देश में स्थित छोटे से लेकर बड़े होटलों ,जिनमें अंग्रेजी में बोलना स्टेटस सिंबल का प्रतीक माना जाता  है,अपनी मातृ भाषा या हिंदी में बोलने को स्टैंडर्ड से नीचे समझा जाता है वहीं वे केवल चीनी भाषा ही समझ और बोल सकते थे। शीघ्र ही हमें समझ में आ गया कि ये कर्मचारी केवल अपने देश की मातृ भाषा बोलने में गौरव का अनुभव करते है,भले ही उनके व्यापार में जो चाहे हो। खेर चूंकि इशारों की भाषा पूरी दुनिया में एक सीही होती है इस लिए थोड़ी कठिनाइयों के बाद हम सारे यात्रियों और उन कर्मचारियों के मध्य एक ऐसी संवाद की भाषा का पुल बन गया जिसके बाद देशों के अंतर का कोई स्थान नहीं था। सारे यात्रियों से सरकार द्वारा निर्धारित यात्रा की फीस जो की केवल अमेरिकन डालर में थी चीनी अधिकारियों द्वारा लेने के पश्चात हमें भोजन के स्थान पर चलने का आग्रह किया गया।सारे यात्री सुबह से केवल नाश्ते पर ही थे अतः तेजी से भोजन के स्थान पर लपके। हमारे भोजन की कल्पना में तो जहां विविध प्रकार के भारतीय व्यंजन थे वहीं जब इस होटल के बफे सिस्टम के भोजन को देखा तो चक्कर खा गए।भोजन की बड़ी सी टेबल पर आठ आठ की समूह में ट्रे में भोजन था।क्या था… सुनिए ” आलू के बने नूडल्स,छोटी छोटी कटी ,उबली गोभी के टुकड़े,टमाटर की फांके, कटे हुए सेब,साथ में उबले गठीले चावल के साथ चोप स्टिक।बगल में नमक की शीशी और बड़े से कप में लाल मिर्ची की चटनी। कैसे खाएं,क्या खाएं,इसी असमंजस में कुछ समय बिताने के पश्चात ,और कोई ऑप्शन ना होने के कारण जैसे तेसे खाया,साथ ही समझ में आ गया कि आगे यात्रा में भोजन केसा होगा! 

        भोजन के बाद ,फिर बस यात्रा आरंभ हो गई।बल खाती सड़कों पर ,पहाड़ों पर चड़ते उतरते,हर हर महादेव के जय घोष करते लगभग 9 घंटो की यात्रा के पश्चात् दिन डूबते डूबते एक छोटे से कस्बे के पास स्थित लेकिन आलीशान गेस्ट हाउस में रात्रि विश्राम के लिए रुके।यहां हम सब का ध्यान एक अजीब सी बात पर गया कि जहां हमारी बस के आगे पीछे पुलिस की गाड़ियां चल रही थी वहीं गेस् हाउस में पहुंचते ही और दो जीप आ गई जिनसे काला चश्मा पहने कुछ लोग हमारे गेस्ट हाउस के चारों तरफ फेल गए।थोड़ी घबराहट तो हुई परन्तु इस बात से निश्चिंत भी थे कि यह यात्रा भारतीय सरकार के द्वारा ,उसके सरंक्षण में हो रही थी,विश्वास था कि हमारे साथ भारत की सरकार भी थी।सारे यात्री अपने निर्धारित स्थानों पर रुक कर फ्रेश हो कर जब भोजन के नियत स्थान पर पहुंचे तो वार्ता लाप का मुख्य विषय यात्रा के अलावा काले चश्मे वाले भी थे।तब टूर गाइड ने जानकारी लेने के पश्चात बताया ये सब हमारी सुरक्षा के लिए हैं।लेकिन धीरे धीरे हमें ज्ञात हो गया कि सुरक्षा के नाम पर हमारी निगरानी हो रही है।असल में बात यह थी कि भारत तिब्बत की आजादी का समर्थक है,दलाईलमा जी को हमने शरण दी हुई है,जबकि चीन तिब्बतियों कि आजादी का विरोधी है तो चीनी अधिकारियों को शक रहता है कि कहीं भारतीय यात्री ,कोई तिब्बत समर्थन में कुछ ऐसा कार्य ना करदें,जिससतिब्बतियों और उनके समर्थकों का उत्साह वर्धन हो।इस लिए ये अधिकारी हम कैलाश यात्रियों की सुरक्षा के नाम पर निगाह रख रहे थे!अब रहीं भोजन की बात तो अब थोड़ी गनीमत थी ।पता चला कि भारत सरकार ने हम यात्रियों के साथ एक रसोइयों का दल भी भेजा था जो यात्रा के विभिन्न पड़ावों में सुबह शाम हमारे भोजन का इंतजाम करते थे। वाह,भोजन में इस पहली यात्रा के पहले पड़ाव में पूरे दिन के बाद अपने देश का भोजन सामने देख कर जो स्वाद की अनुभूति हुई,सच कहता हूं कि उसके सामने 5 स्टार के होटल का भोजन भी फीका लगता।तृप्ति के साथ भोजन करके ठंड में ठिठुरते ,पहली बार जमादेने वाली ठंड का अहसास हुआ।तब समझ में आया कि हम हिमालय के देश में लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर हैं और अगले 6 दिन तक ये ऊंचाई भी 19000 फुट तक हो जाएगी।रात और ठंड ने हम सब को गरम गरम रजाई में घुस जाने को मजबूर कर दिया ।

       सुबह के 4 बजे सारे यात्रियों को जबरदस्ती उठा दिया गया क्योंकि इतनी ऊंचाई पर ,हिमालय के आस पास शाम के 3 बजते बजते अक्सर मौसम का मिजाज बिगड़ने लगता है और बादल,बरसात की संभावना हो जाती है।फिर क्या था उठना ही पड़ा ,मुंह हाथ धोकर तैयार हुए तब  तक 5 बजते नाश्ता भी तैयार हो गया और गर्म गर्म चाय ,ब्रेड,आदी खा कर अगले दिन के सफर में पवित्र कैलाश मानसरोवर के दर्शनों की अभिलाषा लिए बस में सवार हो गए।

       हर हर महादेव के जय घोष के साथ पुनः दूसरे दिन की यात्रा आरम्भ हो गई ।जैसे जैसे हमारी बस हिमालय की ऊँचाइयों में चढ़ने लगी आस पास का नजारा भी बदलने लगा।अब हरियाली के स्थान पर छोटी छोटी सूखी हरी झाड़ियां नजर आने लगी,साथ ही हरे भरे पर्वत भी बगैर हरियाली के सूखे, भूरे उजाड़ पथरीले से होने लगे।दूर दूर तक काली चिकनी सड़क ही नजर आती थी ,किसी बस्ती का नामो निशान तक नहीं था।सहज ही समझ में आ गया कि इस अत्यंत दुर्गम,ठंडे ,ऊंचे स्थान पर मानवीय जीवन कितना संघर्ष पूर्ण होगा।सड़क पर आने जाने वाहन भी गिने चुने ही थे।घंटो के बाद ही कोई वाहन आता जाता  नजर आता था।अब सवाल ये था कि इस इतने दुर्गम स्थान होने के बाद भी आखिर चीन ने क्यों तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था।इस प्रश्न का उत्तर भी थोड़ी देर में हमें मिल गया।लगभग हर 50 किलो मीटर के पश्चात् सड़क के दोनों ओर सीमेंट की,खनिज पदार्थों की खुदाई के लिए फ़ैक्टरी ही फ़ैक्टरी नजर आने लगी।अर्थात चीन ने इस प्राकृतिक सम्पदा को मुफ्त में पाने के लिए ही तिब्बत की कमजोर शासन व्यवस्था को हराकर अपना कब्ज़ा कर लिया था।इसके अलावा हिमालय का यह भाग ही पूरे भारत और चीन प्रायद्वीप की अधिकांश नदियों का उद्गम स्थल है जिनसे पूरे क्षेत्र की पानी की आवश्यकता पूरी होती है।लेकिन हमें क्या,हम तो एक धार्मिक यात्रा ही पर निकले थे।

दोपहर के भोजन के लिए हमारी यात्रा का विराम 1 बजे के करीब एक सुनसान से स्थान पर सड़क के किनारे बने एक सजे हुए से तंबुओं में हुआ।शायद हमारी यात्रा के लिए ही

इसको बनाया गया था ।हमारी बसों के साथ ही हमारी सुरक्षा के लिए लगी पुलिस जीपों ओर एंबुलेंस भी रुक गई।कई यात्रियों ने उनसे संवाद की कोशिश की मगर शायद भाषा का बहाना के कर किसी ने भी हमारी किसी बात का उत्तर नहीं दिया।अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया था कि चीनी भारतीयों को अविश्वास की नजरों से ही देखते हैं।शायद उन्हें भी आदेश होगा की वे यात्रियों से घुले मिले नहीं और एक बात, वे हम यात्रियों को विश्राम स्थलों से बाहर भी नहीं जाने देते थे।यानि की धार्मिक यात्रा के केदी  जैसे की हमारी स्तिथि थी!खेर हमें क्या।हम तो भोले भंडारी के दर्शनों के लिए ही उत्सुक थे। भोजन के लिए रुके तो हम यह देख कर हैरान रह गए की हमारे साथ भारत से आए रसोइयों ने सुबह हम से भी पहले ना जाने कब उठ कर भोजन बना लिया था और हॉट केस में से अब गरमागरम भारतीय भोजन हमें परोस दिया गया था।भोजन के पश्चात फिर से हमारी यात्रा आरंभ हो गई और उसी बलखाती निर्जन सड़क पर लगातार चलते चलते शाम 4 बजे तक पिछली रात की ही तरह गेस्ट हाउस में पहुंच गए।

        अब अगले 3 तक ऐसे ही अनुभवों को लेते हुए सुबह जल्दी उठते,शाम को गेस्ट हाउस में रात बिताते ,निर्जन सड़क से उजाड़ पहाड़ों को देखते ,बोरियत की सीमाओं तक पहुंचते आखिरकार 5  वे दिन को, दोपहर को अचानक हमारी बसें एक बड़ी सी झील के किनारे रुकी,ऊंघते यात्रियों को गाइड के द्वारा यह बताने पर की सामने दिख रही झील ही मानसरोवर झील है तो जैसे यात्रियों में तूफान सा आ गया।सब कुछ भूल,हर्ष से हर हर महादेव का जय घोष करते, श्रद्धा से परिपूर्ण,दोनों हाथ जोड़े पूरी तरह खुली लेकिन अश्रु भरीआंखों से ,सम्मोहित अवस्था में उस पवित्र मानसरोवर झील के दर्शन कर रहे थे जिसके दर्शन और जिसमें पवित्र स्नान की अभिलाषा प्राचीन काल से ही हर भारतीय ,चाहे वो साधु संत हो या गृहस्थ, के ह्रदय में होती है।दूर विशाल ,गोलाकार,शुद्ध नीले वर्ण की, मंद मंद उठती लहरों में दिखता नीले आकाश का प्रतिबिंब,चारों ओर से घिरी पर्वत मालाओं के प्रतिबिंब में जाने केसा आकर्षण था जो हमारे शब्दों की सीमाओं से परे था।  बता नहीं सकते कि ऐसी अद्भुत अवस्था में हम जाने कब तक डूबे खड़े रहे थे कि फिर गाइड ने हमें वापस वर्तमान अवस्था में ला खड़ा किया।हम सब ,सब, यात्राओं के सारे कष्ट,दुखों को भूल कर उस से स्नान करने को बड़ी अधीरता से आग्रह करने लगे।बड़ी मुश्किल से उसके ये समझाने पर कि अभी पहले पवित्र कैलाश के दर्शनों और परिक्रमा के लिए प्रस्थान करना है उसके बाद ही आपको मानसरोवर झील में स्नान का अवसर मिलेगा प्रत्येक यात्री दल माना।बस के पवित्र कैलाश मार्ग पर चलने तक प्रत्येक यात्री तब तक उस पवित्र मानसरोवर झील को निहारता रहा ,जब तक कि वो आंखों से पूरी तरह ओझल नहीं हो गई।

आखिर कार लगभग 2 घंटों के और सफर के पश्चात् हमारी यात्रा पवित्र कैलाश के चरणों में स्तिथ ” डार चिन”नामके छोटे से कस्बे के बाहर यात्रियों के आरक्षण कार्यालय में समाप्त हुई।बस से उतरकर प्रत्येक यात्री का रजिस्ट्रेशन हुआ ओर जैसे ही हम सब कार्यालय से बाहर आए और सामने जो अभूतपूर्व दृश्य  देखा,वह हम सब के मन मस्तिष्क में हमेशा हमेशा के लिए अमिट हो गया। तुरंत ही सब जमीन पर दंडवत हाथों को प्रणाम की मुद्रा में लिए बिछ गए।सामने कुछ ही दूरी पर छोटे छोटे भूरे पर्वतों से घिरा ” पवित्र कैलाश पर्वत” अपनी पूर्ण देविप्या में ,शुभ्र ,उज्जवल हिम से श्रृंगारित ,पूर्ण उच्यिता के साथ ,हमारी हजारों जन्मों की कामनाओं के पुरण हेतु भव्य रूप में हमें दर्शन दे रहा था।हमारी वाणी को जैसे विराम लग गया था।शायद हमारे मनुष्य रूपी अनेक जन्मों की कामनाओं को पूरा करने के लिए, इस संसार चक्र से मुक्ति हेतु हमें आशीष प्रदान कार रहा था ।उस समय विशेष की हम सब को जो अनुभूति हो रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस पवित्र कैलाश पर्वत में शुभ्र हिम के मध्य साक्षात भगवान शिव,देवों के देव महादेव हमें दर्शन दे रहे थे। उस समय विशेष का पूर्ण रूप से वर्णन करने में ,मेरे सारे शब्द कोष आज भी असमर्थ है।

      किसी तरह सब ने अपने आप को संयत किया और अगले दिन ,उस पवित्र कैलाश की पवित्र,निसंदेह भाग्यशाली मनुष्यों को ही ,जन्मों जन्मों के पुण्यों से ही मिलने वाली यात्रा की अधीरता लिए अपने निर्धारित विश्राम स्थल  हेतु चल पड़े। डार चिन का होटल बहुत शानदार था।सब को पूर्ण विश्राम के लिए कह दिया गया था क्योंकि अगले तीन दिनों की यात्रा पैदल ,लगभग 19000 की विशाल ऊंचाई, प्राणवायु ” ऑक्सीजन”की कम उपलब्धता,बर्फ के विशाल ग्लेशियरों पर ,अत्यंत विषम परिस्थितियों में जो करनी थी।आखिर कार भगवान शिव ,अपनी स्वयं की परिक्रमा, जो कि इस संसार के आवागमन से मुक्ति प्रदान करती है,को पूर्ण करने हेतु एक बार और परीक्षा लेना चाहते थे।शाम को एक बार पुनः प्रत्येक यात्री के स्वस्थ्य की जांच डाक्टरों द्वारा की गई।सब यात्रियों को इस तीन दिवसीय यात्रा में आने वाली विषम परिस्थितियों से अवगत भी कराया गया और शुभ कामनाओं द्वारा पूर्ण विश्राम करने हेतु आग्रह किया गया ।

       प्रातः 5 बजे सब यात्रियों को उठाकर पुनः मेडिकल चेकअप किया और हलके नाश्ते के पश्चात् चिर प्रतीक्षित पवित्र कैलाश यात्रा हेतु  डार चिन से 5 किलो मीटर दूर यम द्वार , जहां से पवित्र कैलाश की पैदल तीन दिवसीय यात्रा आरम्भ होनी थी के लिए बस द्वारा रवाना कर दिया गया। सारा वातावरण हर हर महादेव के जय घोषों के साथ गुंजायमान हो गया।

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  1. Asha Rishi says:

    Asha Rishi very interested

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