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                                        यात्रा……शबरीमला मंदिर ( केरल)

                     शबरिमाला मंदिर केरल में स्थित है यह तो शायद हम में से अधिकांश लोग जानते होंगे परन्तु केरल में किस जिले में है और और इस मंदिर की प्रसिद्धि का क्या कारण है यह शायद अधिकांश मध्य एवम् उत्तर भारतीय नहीं जानते होंगे। मै स्वयं  भी नहीं जानता था ,परन्तु जब से इस मंदिर के प्रबंधकों और महिला संगठनों के मध्य इस मंदिर में ,महिलाओं के दर्शन करने का विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ,टी वी और समाचार पत्रों में जब मंदिर की चर्चा हुई तब मेरी इच्छा इस मंदिर के संबंध में और जानकारी लेने की हुई तो आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि केवल गूगल बाबा को छोड़ कर किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी ,।थी तो बस इतनी कि यह मंदिर केरल में है पर केरल में किधर ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए सभी संभव सूचनाओं से कन्फ्यूज़न और बढ़

    गया ,तब यह निर्णय लिया कि सीधे केरल प्रदेश कि राजधानी ” त्रिवेंद्रम ” ही चला जाए!

     आखिर कार एक दिन समाचार पत्र पढ़ते जब पता चला कि शबरीमाला मंदिर प्रत्येक माह  में केवल 5 दिन ही खुलता है और केवल वर्ष मे 14 नवंबर से 14 जनवरी संक्रांति तक पूरे 2 माह तक दर्शनों के लिए खुला रहता है तो मेरी उत्सुकता इस मंदिर के दर्शनों के लिए चरम पर पहुंच गई।सामने कैलेंडर देखा तो पता चला कि अरे अभी तो अक्टूबर माह चल रहा है ,तो फिर क्या था , आनन फानन में ट्रेन में सीट बुक की और चल दिया, बहू प्रतीक्षित शबरी मला मंदिर की ओर,केरल प्रदेश कि ओर , और चल दिए केरला की राजधानी ” तिरुवंतपुरम” की ओर !

          अपने गृह स्थान मथुरा से लगातार 50 घंटों से भी अधिक रेल यात्रा कर रेल तिरुअनंतपुरम से थोड़ा पहले अर्नाकुलम नामक स्टेशन पहुंची तो रेलवे स्टेशन का नजारा देख चौंक पड़ा।जिधर भी दृष्टि जाती थी हर तरफ एक जैसे ही वस्त्र धारी लोगों के समूह  दृष्टि गोचर हो रहे थे, अर्थात काली लुंगी पहने ,उसके ऊपर गले तक कोई वस्त्र नहीं ,सर के ऊपर काले रंग का ही पगड़ी नुमा वस्त्र जिसके अंदर कोई पोटली सी दबी थी, एवं गले में तुलसी की माला समेत रंग बिरंगी मालाए पहने हुए लोगों के समूह ।ये दृश्य देख मुझ से जब रहा नहीं गया और निकट बैठे सह यात्री से मैने जब इस अजीब से वस्त्र पहने लोगों के बारे में पूछा तो पता चला कि ये सारे के सारे शबरी मला मंदिर के दर्शनों हेतु जा रहे है।उसी सहयात्री ने टूटी फूटी हिंदी एवं अंग्रेजी में जब यह भी बताया कि इस मंदिर के लिए इसी अर्नाकुलम स्टेशन से सीधी रेल भी सीधी चेंग नूर स्टेशन के लिए जाती है तो हम तुरंत ही इसी अर्नाकुलम स्टेशन पर उतर गए ।टिकट खिड़की पर मंदिर जाने के लिए और जानकारी लेनी चाही तो उसने रूखे से  उंगली उठा कर सूचना केंद्र की ओर जाने को इशारा कर दिया।सूचना केंद्र पर कोई था ही नहीं,ट्रेन का समय हो रहा था इस लिए भाग्य भरोसे उन अनगिनत काले वस्त्र धारण किए यात्रियों के साथ ही चेग नूर स्टेशन की ओर जाने वाली रेल में सवार हो गया।

                रेल के डिब्बे में मेरे अतिरिक्त शायद अन्य कोई यात्री हिंदी भाषी नहीं था ,इस लिए जिस से भी शबरी मला मंदिर एवम् उस तक पहुंचने के लिए जानकारी लेने की कोशिश की ” हिंदी नई” अथवा ” नो नॉलेज ” कह कर निराश ही किया।खेर कोई अन्य चारा ना होने के कारण धीरज धर लिया कि चलो 2 घंटे पश्चात् ” चेंगनुर” स्टेशन उतर कर ही जानकारी लेंगे ।इस पूरी 2 घंटों की यात्रा के दौरान बाहर रेल की खिड़की से केरल प्रदेश की हरियाली एवम् सुंदरता ने मंत्रमुग्ध कर लिया और केरल की सुंदरता को निहारते पता ही नहीं चला कि 2  घंटे की यात्रा कब समाप्त हो गई ।स्टेशन आने पर जब ये सारे काले वस्त्र वाले समूह उतरे तो संतोष हुआ कि हम सही मार्ग पर हैं,हम भी चेंग्नुर उतर गए।

              शाम के 5 बजे ,चेंग नूर स्टेशन भी काले वस्त्र पहने यात्रियों से पूरी तरह भरा हुआ था।इन्हीं के मध्य मार्ग बनाते  स्टेशन से बाहर आने पर ,मंदिर की तरफ से लगे सहायता बूथ को देख कर कुछ संतोष हुआ, और सीधे जा पहुंचे उस ओर।

              बूथ पर जा कर पहले तो अंग्रेजी में मंदिर के बारे में जानकारी लेने लगा ,तो अचानक ही एक व्यक्ति मुझे हिन्दू भाषाई जान कर जब हिंदी में बोला तो बड़ी हैरानी हुई लेकिन संतोष भी हुआ। पहली बारअब दिल खोल कर मंदिर के बारे में जान कारी ली ,तो…. सच कहता हूं ,एक बार तो होश ही उड़ गए।इतनी कठिन यात्रा ,पहले ही मै लग भग 50 घंटों की यात्रा कर के आया था , और अब जो यात्रा होनी थी ,वो तो अद्भुत ही होगी,ऐसा अब ज्ञात हुआ।

    अब आप भी सुनिए,इस रेलवे स्टेशन से पहले बस द्वारा पूरे 3  घंटों की बस यात्रा जो कि पूरी 100 किलोमीटर की है,करनी होगी, उसके पश्चात लगभग 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद ही मंदिर पहुंच सकते हैं।अब आप पूछेंगे कि इस में अद्भुत बात क्या होगी ,तो चलिए मेरे साथ और इस अद्भुत ही नहीं ,अत्यंत ही कठिन,दुर्गम ,यहां तक कि आपकी शारीरिक क्षमताओं को परखने वाली यात्रा का अनुभव करने को !!

            सहायता बूथ के सामने ही खड़ी एक बस में जाकर सीट घेर ली,घेर ली का मतलब भयंकर दर्शनार्थियों की भीड़ में सीट का मिलना भी किस्मत की ही बात थी ! बस चलने में थोड़ा समय शेष था ,अत: पास बैठे सहयात्रियों से और जानकारी लेनी चाही तो वहीं भाषा की समस्या ,कुछ देर  बाद एक सहयात्री ने हमें दुविधा में पड़े देख मेरी, टूटी फूटी अंग्रेजी,हिंदी एवं अपनी भाषा में मेरा ज्ञान वर्धन किया।

    उसके अनुसार शबरी मला मंदिर का रामायण में वर्णित भील महिला शबरी से कोई संबंध नहीं है।इस मंदिर में मुख्य पूजा “भगवान अयप्पा” जो की भगवान विष्णु एवं शंकर के सम्मिलित अंश हैं, की, की जाती है।

    कथा के अनुसार “शबरी मला मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर मंदिर के ऊपर आकाश में मध्य रात्रि को एक दिव्य ज्योति दिखाई देती है ,जिसे देखने के लिए लाखों दर्शनार्थी उस विशेष अवसर पर यहां एकत्रित होते है।इस यात्रा के लिए जो कि दक्षिण भारतीयों के लिए : मक्का मदीना ” की तरह ही पवित्र है और इस यात्रा के लिए उन्हें  2 माह तक मांस मदिरा छोड़ना होता है ,जमीन पर शयन करना होता है एवम् काले रंग के वस्त्र पहन कर संयमी जीवन व्यतीत करना होता है साथ ही गले में तुलसी माला धारण करना भी आवश्यक होता है।मान्यता है कि इन नियमों का पालन करने पर ही भक्त को मकर ज्योति के पवित्र दर्श होते है ,जिस से उनकी मनोकामना पूरी होती है।

    इस मंदिर के दर्शनों हेतु जो भी यात्री आते हैं वे सबसे पहले केरल की सबसे बड़ी नदी पंबा या चंद्रभागा नदी में स्नान करते है ,उसके बाद ही यात्रा आरंभ करते हैं ,यात्रा समाप्त होने पर पुनः इसी नदी में स्नान करते है एवम् अपने काले वस्त्रों का यहीं पर त्याग करते है।जब ये यात्रा आरंभ होती है तो लगभग पूरे दक्षिण भारत से यात्रियों के समूह के समूह यहां दर्शन करने को आते है।इन यात्रियों के सम्मान एवम् सुविधा के लिए पूरे दक्षिण भारत में विशेष प्रबंध, कुंभ जैसे महा मेले जैसे ही किए जाते है।यह मंदिर ” पेरियार राष्ट्रीय ” पार्क के मध्य घने जंगलों में स्थित है, और यह राष्ट्रीय पार्क अपने भालू,शेर,हाथी आदि अनेकों जंगली प्राणियों का आवास है।इसी पार्क के किनारे दक्षिण भारत की एक सबसे बड़ी झील ” वेंबनायर” है जो कि केरल का एक अत्यंत प्रसिद्ध टूरिस्ट स्थान है।

               ठीक 6 बजे शाम हमारी बस पेरियार राष्ट्रीय पार्क के मध्य स्थित शबरी मला मंदिर के लिए चल दी ।थोड़ी ही देर में तरफ गहन अंधकार और गहन जंगल में होने का आभास भी जैसे रोमांचित करने लगा।ऊंची,नीची पहाड़ी मार्ग पर बस धीरे धीरे बलखाती चल रही थी और साथ ही चल रहे थे इन पहाड़ियों ,जंगलों में स्थित विशाल,विशाल वृक्ष जिनसे इस अंधियारी रात का अंधेरा और बढ़ गया था।मार्ग के दोनों ओर पेरियार राष्ट्रीय पार्क के बोर्ड लगे हुए थे जिनमें अन्य बातों के अलावा इस जंगल में रहने वाले जीवों के बारे में लिखा था।इसी तरह 3 घंटे की यात्रा  समाप्त होने को आई तो एक अनोखा दृश्य दिखाई दिया। तेज रोशनियों और तेज आवाज में बजते दक्षिण भारतीय संगीत ने जैसे एक नई दुनिया मे ही आने का आभास करा दिया।

                   बस से उतरने पर जैसे मै किसी विशाल मेला स्थल पर आ पहुंचा था।यात्रियों के समूह के समूह ,बसों एवम् अन्य वाहनों से उतर कर एक निश्चत दिशा की ओर बढ़ते दिखाई दिए। मै भी उसी ओर चल दिया ।कुछ देर चलते ही रोशनी और तीव्र संगीत ने ध्यान आकर्षित कर दिया ।

    एक मध्य गति में बहती नदी ,उसमे स्नान करते हजारों लोग,चारों ओर बड़े बड़े पंडाल एक अलग ही दुनिया में आने का अहसास कराने लगा।सम्पूर्ण दृश्य,नजारे ऐसा अनुभव करा रहे थे जैसे मै सुदूर दक्षिण भारत में नहीं अपितु  उत्तर भारत में लगने वाले किसी कुंभ मेले में घूम रहा हूं। पंबा नदी पार करने के बाद मै भी मंदिर जाने वाले हजारों यात्रियों में शामिल हो गया।

             कुछ दूर चलते ही सामने सीढ़ियां आरंभ हो गई जो की लगभग सौ के करीब थी।प्रत्येक यात्री उन सीढ़ियों पर सर झुका कर चढ़ रहा था । सीढ़ी समाप्त होते ही अचानक लगा जैसे मै किसी प्रदर्शनी स्थल पर आ पहुंचा हूं ।एक विशाल आहाता,जिसके ठीक मध्य में एक माध्यम आकर का शिव मंदिर जो कि चांदी से मंढा हुआ था ,जो भी यात्री सीढ़ी चढ़ कर आता ,सर्व प्रथम इस मंदिर के आगे शीश झुकाते हुए आगे बढ़ जाता।इस मंदिर के एक किनारे पर एक विशाल पंडाल ,जो इस रात्रि के समय थके हुए यात्रियों से भरा हुआ था ।पता नहीं ,ये सब यात्रा आरंभ करने वाले थे अथवा यात्रा समाप्ति के पश्चात आराम कर रहे थे ।

    मैदान के दूसरे किनारे पर पुलिस की टीम मुस्तैदी से आने जाने वाले यात्रियों पर नजर रखे हुए थी।इसी एक किनारे पर कुछ कम्प्यूटर रखे थे ,जिन पर कुछ पुलिस वाले बैठ कर लिखा पढ़ी कर रहे थे,ओर उनके सामने भी छोटी छोटी यात्रियों की लाइन लगी थी। इन पुलिस कर्मचारियों के पीछे एक बड़ा सा फ्लेक्सी बोर्ड लगा था जिस पर मलयालम भाषा में बड़े बड़े शब्दों में जाने क्या लिखा था साथ ही, शायद मंदिर संबंथी साधुओं,आदि के चित्र बने हुए थे,जो मेरी भाषा की अनभिज्ञ होने के कारण मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।मैने देखा कि अधिकांश यात्री पुलिस काउंटर पर ना रुक कर सीधे ही आगे बढ़े जा रहे थे,तो मै भी उनका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ गया,हांलांकि यात्रा के अंत में मुझे काफी परेशानी इसी के कारण झेलनी पड़ी,जिसका वर्णन मै यात्रा के अगले पड़ाव में करूंगा।

             इस आहाते के समाप्त होते ही यात्रा मार्ग फिर छोटा हो गया जिस कारण यात्रियों का दवाब काफी अधिक हो गया।अभी यात्रा मार्ग एक दम समतल ही था ।इस मार्ग के आरंभ में जब मेरी दृष्टि अपनी बाईं ओर गई तो मै हैरान रह गया ।इस कें किनारे पर सैकडों पालकियां रखी हुई थी , और कुछ किनारे की दीवार पर टनगी हुई थी।इसके पास ही एक बोर्ड लगा था जिस पर अपरिचित भाषा में पालकी के रेट लिखे हुए थे,जिसे देखकर मेरे तो जैसे होश ही उड़ गए ,”20000  रुपए”, मै इतना तो जान ही गया था कि आने और जाने के रेट होंगे।लेकिन इतने अधिक रेट का ओचित्य मुझे जब समझ आया जब मेरी यात्रा कुछ देर बाद वास्तविक रूप में आरंभ हुई ! थोड़ा आगे चलने पर एक बड़ा सा द्वार दिखाई दिया जिसके नीचे से यात्री निकाल रहे थे और ऊपर लिखा था ” पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में आपका स्वागत है “।

            इस बड़े से द्वार को पर करते ही जो सामने देखा तो एक बार तो कलेजा मुंह को आ गया ।एक दम सीधी,लगभग पचास डिग्री की चढ़ाई।सामने एक ओर बड़ा सा बोर्ड लगा था जिस पर स्थानीय ओर अंग्रेजी भाषा में लिखा था कि मंदिर कि दूरी 6 किलो मीटर है,अरे बस इतनी सी दूरी,इस से अधिक दूरी की पैदल यात्रा तो में वेश्नो देवी की यात्रा एवम् मथुरा में गोवर्धन पर्वत की यात्रा जो की लगभग 15 से 25 किलो मीटर की थी,कर चुका था। अरे इसे तो मै थोड़ी ही देर में पूरी कर लूंगा।बस फिर क्या था।भगवान ” अय्यप्पा ” के जय घोष के साथ मै उत्साह से भरपूर यात्रा के पहले कदम की ओर बढ़ चला।

             100 मीटर,जी हां 100 मीटर ही चला था,नहीं ,नहीं चला नहीं था ,बल्कि यात्रा मार्ग पर ,पवित्र शबरी मला मंदिर के प्रसिद्ध भगवान ” अय्यप्पा ” के दर्शनों हेतु चढ़ा ही था कि यात्रा का सारा जोश और उत्साह एक दम ऐसे ठंडा पड़ गया ,जैसे उफनते हुए दूध पर पानी के छीटें मरते ही उफान एक दम बैठ जाता है।जी हां ,मेरा विश्वास कीजिए ,इतनी तीव्र चढ़ाई कि मेरा विश्वास हिल गया।सच, आप जरा सोचिए,एक दम सीधी चढ़ाई,नवंबर का दक्षिण भारत का उमस और तेज गर्मी का मौसम, रात के लगभग दस बजे का समय ,अनजान भाषा का प्रदेश,कोई परिचित साथ नहीं तो क्या हाल मेरा हुआ होगा। मार्ग तो काफी चोड़ा था,मार्ग के ठीक मध्य में लोहे की रेलिंग लगी हुई थी ,जिसके दोनों तरफ यात्री आ जा रहे थे ।

    मैने गौर किया कि अधिकांश यात्री ,चाहे वे दर्शन हेतु जा रहे थे अथवा दर्शन करके वापस लौट रहे थे ,उस लोहे की गोल पाईप की रेलिंग को पकड़ पकड़ कर ही चढ़,उतर रहे थे। और गौर कीजिएगा कि जब यात्रा मार्ग की चढ़ाई और तीव्र हो जाती थी तब उस चढ़ाई को कम करने के लिए 10 या. 12 सीढ़ी भी बना दी गई थी।चलते चलते मेरी स्पीड अगर नापी जाती तो शायद यह एक घंटे में 100 मीटर ,जी हां ,किलोमीटर नहीं,100 मीटर ही कह रहा हूं ,नापी जाती।अधिकांश यात्री तो दस कदम चलते ,फिर सुस्ताते ,फिर पाईप पकड़ कर चढ़ने लगते।

    अब चूंकि मेरा इस यात्रा का कार्यक्रम निश्चित था,आने जाने का प्रोग्राम रेल रिजर्वेशन के सहित तय था,जिसके अनुसार मुझे कल सुबह तक यात्रा समाप्ति करके ,वापस चेंग नूर आ कर आगे बढ़ना था ,इस लिए मै भगवान ” अय्यप्पा ” की शरण में जाकर , किसी भी तरह उनके दर्शनों हेतु ऊपर मंदिर पहुंच कर ,सुबह तक वापस आने हेतु अपनी कमर ,कमर ही नहीं अपने दिल ,धड़कन को मजबूत करके ,धोंकनी की तरह चलती सांसों को थाम थाम कर ,अपनी पूरी ऊर्जा,पूरी ताकत लगा कर ऊपर चढ़ने लगा।

     मेरे साथ के सहयात्री ,जिन्हें शायद मेरी तरह वापसी कि कोई जल्दी नहीं थी, और जो थोड़ी थोड़ी दूर पर विश्राम करते हुए बैठते जा रहे थे ,को पीछे छोड़ते हुए ,पूरी ताकत लगा कर ऊपर चढ़ते जा रहा था।मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि शायद इस 6 किलोमीटर की यात्रा में ,मैने 16 बार सोचा होगा , कि ये यात्रा मेरे बस की नहीं।वो तो मेरा दृढ़ निश्चय,तेज लगन और भगवान ” अय्यप्पा ” की कृपा के कारण ही ये चढ़ाई करने में, मै सफल हो पाया।अब जरा इस यात्रा के मार्ग का वर्णन और करूं ,जिस से आपको इस यात्रा की दुरूहता का शायद थोड़ा सा अनुमान हो सके।इस 6 किलोमीटर की यात्रा में यात्रा मार्ग के दोनों ओर 3 के करीब कार्डियक सेंटर ,साथ ही दोनों ओर 6  की संख्या में प्राथमिक चिकित्सा संस्थान बने हुए थे।थोड़ी थोड़ी दूरी पर बोर्ड लगे हुए थे जिनमें दोनों भाषाओं में लिखा था कि अगर आपको यात्रा करते समय ,सांस लेने में परेशानी हो रही हो ,या छाती में दर्द होने लगे तो तुरंत नजदीक के चिकित्सा संस्थान में अपने को दिखाने में कोई लापरवाही ना करें,ये हार्ट अटैक का कारण भी बन सकता है।

    मार्ग के दोनों ओर मंदिर संस्थान की ओर से यात्रियों की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए मुफ्त में एनर्जी ड्रिंक्स दिए जा रहे थे।मुझे विश्वास है कि मेरे इस वर्णन से आप इस यात्रा की दुरुहता समझ पाएं,साथ ही मुझे अब समझ भी आ रहा था कि क्यों आम यात्री इस यात्रा में ना के बराबर की संख्या में थे।जो भी यात्री थे वे अपनी मान्यता और दर्शनों के दृढ़ निश्चय के कारण ही यात्रा कर पा रहे थे।इस संबंध में आप ये भी स्मरण रखें कि मेरे जैसे गिने चुने यात्री को छोड़ कर ,प्रत्येक यात्री अपने सर पर एक पोटली भी बांधे चढ़ रहा था।वास्तव में वे धन्य थे!

              इसी तरह अपनी पूरी शक्ति लगा कर  लगभग दो घंटे लगातार चलने एवम् चढ़ाई के पश्चात आखिर कार मै अंतिम एक किलोमीटर दूरी शेष रहने के निशान पर जब पहुंचा तो ,मेरी सारी शक्ति जैसे समाप्त हो चुकी थी।पैरों में लगातार चलने के कारण तीव्र दर्द की लहर उठने,पसीने से पूरी तरह तरबतर होने के कारण आखिर कार

     मैने निर्णय किया कि मुझे अब कुछ देर अपनी यात्रा को विश्राम देना ही चाहिए।

               मैने जिस यात्रा के जिस पड़ाव पर रुकने का निर्णय किया ,वहीं सामने पुलिस का बेरीकेट लगा हुआ था।मैने देखा कि उस बेरीकेट से दो रास्ते जा रहे हैं।मैने विश्राम करते करते एक  पुलिस वाले से जब इन दो रास्तों का कारण पूछा तो उसने ” नो हिंदी” कहा कर मना कर दिया ।फिर मेरी दृष्टि एक दरोगा पर पड़ी तो मैने उन्हे जोर से आवाज लगा कर अंग्रेजी भाषा में इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने पहले मेरा परिचय पूछा ,मुझे सुदूर उत्तर से आया जान कार उन्हे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बताया कि जिन यात्रियों ने पहले पड़ाव पर ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन कराया है वे इस बांए वाले रास्ते से जाते हैं और बिना रजिस्ट्रेशन वाले दांए हाथ से जा रहे हैं और उन्हें अधिक घूम कर एक किलोमीटर ज्यादा चढ़ाई करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करना होता है।

    अत्यधिक थकान होने के कारण मै एक एक मीटर बड़ी ही कठिनाई से चल रहा था और उनके अनुसार अभी दो किलोमीटर और चलना होगा तो मेरी तो जैसे सांस ही रुकने लगी।मैने जब उन्हें कहा कि मुझे तो पहले पड़ाव पर कोई ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन का स्थान ही नहीं दिखा तो उन्होंने बताया कि पहले पड़ाव पर जो कुछ पुलिस कर्मी कम्प्यूटर के समक्ष बैठे थे वे ही ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर रहे थे ,एवम् इस संबंध में बड़े बड़े बोर्ड पर लिखा भी था।मैने निराशा में जैसे अपना सर ही पीट लिया।पहली बार भाषा से अनभिज्ञ होने से बहुत कष्ट एवम् अफसोस हो रहा था।

    मैने उनसे जब अपनी स्थिति से अवगत कराकर उनसे बांए हाथ वाले अपेक्षाकृत छोटे मार्ग पर जाने का अनुरोध किया तो उन्होंने अपनी विवशता बता कर स्पष्ट इनकार कर दिया।साथ ही उन्होंने एक जानकारी और दी कि ” अय्यप्पा स्वामी ” का मुख्य मंदिर रात्रि की अंतिम आरती के पश्चात ठीक 11बज कर 30 पर बंद हो जाएंगे और फिर सुबह ठीक  5 बजे खुलेंगे।साथ ही मेरा ज्ञान वर्धन और किया कि सुबह के लिए यात्रियों की लंबी लंबी पंक्ति रात की आरती के पश्चात ही लगना आरंभ हो जाएगी,जिसमें कम से कम आपका दर्शन का नंबर 6 से7 घंटे बाद ही आ पाएगा क्योंकि अधिकांश दर्शनार्थी सुबह की आरती के पश्चात दर्शन करने को सही मानते हैं। मै अवाक था।घड़ी पर नजर डाली तो ठीक 11 बजे थे।

    मेरे पांव ही नहीं पूरा शरीर दर्द ऑर थकान से ,एक कदम भी आगे चलने को तैयार नहीं था।इस का कारण यह भी था कि जिस यात्रा में आम दर्शनार्थी 6 घंटे से अधिक समय लगाता है उसे मैने कम समय होने के कारण 2 घंटे में ही पूरा किया है , जिसके परिणाम मेरे शरीर की ये हालत हो गई थी कि अब एक कदम भी चलना मुश्किल दिख रहा था।मेरी मुख मुद्रा देख कर उन दरोगा जी ने मुझे थोड़ी दिलासा देने की कोशिश करते हुए ये भी बताया कि इस दूसरे मार्ग वाली यात्रा हालांकि एक किलोमीटर अधिक है परन्तु चढ़ाई तो केवल एक किलोमीटर की है ,उसके पश्चात ढलान वाला मार्ग है।इस सारे वार्तालाप और विश्राम में 10 मिनट और बीत चुके थे ।स्पष्ट था कि मुझे जो भी निर्णय लेना था तुरंत लेना था , और मैने ले लिया।अपनी शेष बची खुची ताकत बटोर कर ,दृढ़ निश्चय करके ,तुरंत चलने का फैसला किया।मैने भगवान ” अय्यप्पा स्वामी ” से मन ही मन मुझे इस अंतिम दो किलोमीटर की यात्रा इन बीस मिनट में करने के लिए शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की , और में सब कुछ भूलकर आगे चल दिया।

           मै दर्शनों के लिए इतना लालायित था कि उस शेष दो किलोमीटर में , मै शायद जितना अधिक तेज चला था ,आज सोचता हूं कि अगर उस समय कोई मैराथन रेस होती तो मै बड़ा से बड़ा रिकॉर्ड अपने नाम कर लेता।

            कहते हैं ना कि इच्छा शक्ति से भगवान भी मदद करते हैं , मै मंदिर बंद होने से ठीक 5 मिनट पहले मंदिर परिसर के विशाल दरवाजे तक आ पहुंचा था।नीचे जहां तक मेरी दृष्टि जाती थी हर तरफ जगमगाते प्रकाश की चकाचौंध के बीच लाखों ,लाखों दर्शनार्थियों की भीड़ मौजूद थी।दरवाजे के बाद दूर दूर तक स्टील की रेलिंग का जाल बिछा था ।

    इस रेलिंग के अंदर यात्री को शायद एक किलोमीटर की और यात्रा जितना चलना पड़ता होगा ,परन्तु इस दर्शन के आज के अंतिम अवसर पर शायद उपस्थित अधिकांश यात्री दर्शन कर चुके थे और वे सब के सब जिधर तक नजर जाती थी , आड़े ,तिरछे ,इधर उधर ,जिसको जहां भी जगह मिल गई थी वहीं थकान के कारण गहरी निद्रा में डूबे हुए थे।अब मै जान चुका था कि वे क्यों बेहोशी सी अवस्था में बेतरतीब पड़े हुए थे।

          इस अंतिम 5 मिनट की शेष अवधि में मेरे अतिरिक्त कोई और यात्री अब मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर नहीं जा रहा था।यात्रा के आरंभ में जो यात्रियों के समूह मेरे साथ चले थे या जो यात्रा के मध्य मुझे मिले थे ,उन्हे मै कब का बहुत पीछे छोड़ चुका था और जो अब भी थोड़े से यात्री मेरे साथ यहां तक आ पहुंचे थे ,उन्हे मेरी जितनी दर्शनों की जल्दी नहीं थी।वे तो शायद सुबह ,सुबह उठकर ही दर्श करने वाले थे।

             अतः जब मै मंदिर, जो कि अब मेरे सामने ही था ,उस तक जाने वाले मार्ग के गेट को एक पुलिस वाला बंद कर रहा था।जैसे ही उसने गेट बंद किया कि मेरे साथ ही एक अन्य दर्शनार्थी भी उस गेट के सामने जा पहुंचा।पुलिस वाले ने इनकार में सर हिला दिया कि अब गेट नहीं खुलेगा।अभी मै कुछ सोचूं कि तभी मेरे साथ के यात्री ने अपनी भाषा में उस पुलिस वाले से कुछ कहा और साथ ही अपने हाथ में थामे ,लोकल भाषा में टाइप किया एक पत्र जिसके आरंभ मै सरकारी ” अशोक ” का चिन्ह छपा था उसे दिखाया,साथ ही अपनी भाषा में उस से जोरदार आवाज में बहस की,जिसके परिणाम स्वरूप उसने उसके लिए गेट खोल दिया।

    अब क्या था मेरे समक्ष, अभी नहीं तो कभी नहीं की स्थिति थी।मैने भी तुरंत निर्णय लेते हुए अपनी जेब में रखे स्टेट बैंक के आई कार्ड ,जिस पर बड़ा सा स्टेट बैंक का नीला, गोल चिन्ह अंकित था उसे दिखा दिया,साथ ही उससे हिंदी,अंग्रेजी भाषा में दर्शन के लिए मुझे भी प्रवेश करने का अनुरोध किया।साथ ही मैने जोरदार शब्दों में कहा कि भाई , मै भी एक सरकारी अधिकारी हूं,अकेला हूं ,बड़ी दूर दिल्ली से आया हूं,कृपया कैसे भी मुझे अंदर जाने दो। मै अच्छी तरह जानता हूं कि एक साधारण पुलिस कर्मी होने के कारण ना तो उसे अंग्रेजी आती होगी और ना ही हिंदी ,पर अचानक उसने मुझ से एक ही शब्द बोला ” दिल्ली ” और आगे की भाषा मेरे समझ के बाहर थी,उसने मुझे अंदर आने का संकेत कर दिया ।मेरे पास अब कुछ ही मिनट बचे थे दर्शन के लिए इस लिए बिना उसे धन्यवाद देते मै तुरंत मंदिर की ओर दौड़ पड़ा।

              ” भगवान अय्यप्पा स्वामी ” का मंदिर ,जिसके समक्ष मै पूर्ण श्रद्धा,समर्पण से ,हाथ एवम् आंख बंद किए खड़ा था ,जिसके बारे में,मैने वर्षों पहले अचानक ही टी वी पर सुना था ,जो शायद मेरे मूल स्थान से हजारों किलोमीटर दूर था ,जिसके बारे में अधिकांश उत्तर ,मध्य भारत के लोगों की जानकारी ना के समान थी, मार्ग के समस्त कष्ट को पूरी तरह विस्मृत करके ,उस पवित्रतम मंदिर के समक्ष खड़ा था।सत्य कहता हूं ,उस वक्त मै मंदिर के समक्ष नहीं अपितु एक अलौकिक दुनिया में खड़ा था।तभी परिसर में लगे बड़े स्पीकरों से गूंजती आरती ने जैसे मुझे वर्तमान दुनिया में ला खड़ा किया।आरती शुरू हो चुकी थी।

    मंदिर के चारों ओर खड़े दर्शनार्थियों के विशाल समूह उस आवाज के साथ ,अपनी आवाज में अपनी श्रद्धा प्रकट कर रहे थे।अनजानी भाषा होने के कारण ,मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ,परन्तु उस समय मैने हृदय से पहली बार अनुभव किया कि प्रार्थना की एक ही भाषा होती है और वो होती है केवल और केवल श्रद्धा और श्रद्धा। मै भी उस समय भाषा ,स्थान को भूलकर आरती की प्रत्येक अंतिम पंक्ति  का अंतिम शब्द जो ” अय्यप्पा स्वामी शरणम् ” की होती थी ,पूरी शक्ति से बोलता था ” अय्यप्पा स्वामी शरणम् ” ।

           आरती समाप्त हुई ,पवित्र दर्शन हुए ,अपने भाग्य को सराहते ,जैसे ही में आगे बढ़ा तभी जाने किधर से गेट बंद करने वाला सिपाही मेरे सामने आ खड़ा हुआ ” प्रसाद ,प्रसाद ” ही मुझे समझ आया और समझ आया कि वो अनजानी भाषा में मुझे संबोधित करते हुए मंदिर के एक कोने में खड़ा होने के लिए संकेत कर रहा था।आरती के पश्चात ,मंदिर के कपाट बंद करके  एक पुजारी अपने हाथ से अल्प मात्रा में जहां चरणामृत जैसी लेकिन थोड़े काले रंग की ,तीव्र गंध वाला पेय दे रहा था ,वहीं दूसरा पुजारी प्रसाद जैसी कोई अनोखी परन्तु दिव्य स्वाद वाली वस्तु दे रहा था।हजारों की भीड़ ,उन के लिए जैसे चीख चीख कर ,एक दूसरे को धकियाते ,हाथ बढ़ा रहे थे वहीं उस पुलिस वाले की सहायता से उसने मुझे जिस स्थान पर खड़ा होने के लिए कहा था , और जो पुजारियों के एक दम समक्ष था ,आसानी से मुझे ,भगवान अय्यप्पा स्वामी की कृपा रूपी ,अमृत रूपी ,चरणामृत एवम् प्रसाद ,आसानी से मिल गए थे।मैने इसे साक्षात भगवान की कृपा मानते हुए उस पुलिस वाले को हृदय से धन्यवाद देते हुए अपनी आंखे फिर एक बार बंद कर ली।

                मनोवांछित इच्छा पूर्ण होते ही जैसे मुझ पर थकान हावी हो गई , मै एक कोने में जैसे पसर सा ही गया।कुछ देर के विश्राम के पश्चात पीड़ा से जूझते मैने अपने पैरों को कुछ आराम देने हेतु अपने हेंड बेग से पैरों पर लपेटने वाली ” क्रेप बैंडेज निकली , दोनों पैरों पर बांध ली।  कुछ समय विश्राम के पश्चात् मुझे स्मरण हो आया कि मुझे अभी वापस भी जाना है , मै खड़ा हो गया।जैसे चमत्कार हो गया ,मैने महसूस किया कि कुछ देर पूर्व जहां मै एक कदम भी चलने की स्थिति में नहीं था ,वहीं मै अपने को लगभग पूर्ण स्वस्थ महसूस कर रहा था।इसका अनुभव मैने अपनी पूर्व कि कई यात्राओं में भी किया है ,जिसका में एक ही उत्तर समझता हूं कि उद्देश्य पूर्ण होने पर हम यात्रा से होने वाली सम्पूर्ण थकान और कष्ट भूल जाते हैं और एक नई ऊर्जा से भरपूर तरो ताजा  हो जाते हैं।

                अब इस ऊर्जा को मै व्यर्थ में नहीं गंवाना चाहता था ,इस लिए उठ खड़ा हुआ ।वापस जाने से पहले मै इस पवित्र ” शबरी मला ” मंदिर की पूर्ण भव्यता को अपनी स्मृति में हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए ,उसके अवलोकन हेतु सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।अब मैने जाना कि ये स्थान तो इतना विशाल है जिसकी कल्पना हम उत्तर भाषी शायद ही कर पाएं।अनगिनत भवन ,विशाल पक्के मैदान ,बड़े बड़े मंच ,जगह जगह अनेकों काउंटर विभिन्न कार्यों के लिए बने हुए थे।कोई भी स्थान ऐसा नहीं था जहां ये काले वाटर धारी यात्री ना समाए हो।यहां एक नहीं अपितु विभिन्न देवी देवताओं के सुंदरतम स्वर्ण जड़ित मंदिर बने हुए थे जी एक अलग ही दुनिया का अहसास करा रहे थे।

    अनेकों यात्री अपने स्वजनों के साथ पूजा पाठ में लगे हुए थे।इस मंदिर की एक और विशेषता से मेरा परिचय हुआ कि प्रत्येक यात्री कुछ ना कुछ दान अर्पित कर रहा था।अधिकांश यात्री इन दान की सामग्री को अपने सर पर ही रख कर ,मान्यता पूर्ण होने से ,आभार प्रकट करने के लिए ,काउंटरों पर जमा कर रहे थे। मै पुनः हैरान था कि मुझसे खाली हाथ नहीं चढ़ा का रहा था ,वहीं ये श्रद्धालु उसे अपने सर पर रख कर ही लाए थे।धन्य है उनकी श्रद्धा एवम् धन्य है ये भक्त और उनकी भक्ति। मै पुनः एक बार भगवान” अय्यप्पा स्वामी की जय ” के उद्घोष के साथ वापसी की अपनी यात्रा  के लिए बढ़ गया!

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