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    कबूतर …………….एक आतंकवादी

             शायद इस शीर्षक को पढ़ कर आप सब आश्चर्य में पड़ गए होंगे कि ये क्या लिखा है, परंतु जब आप मेरे साथ इस शाब्दिक अनुभव को पढ़ेंगे तो निश्चय ही आप का दृष्टिकोण बदल जाएगा।

            कबूतर पूरे विश्व में शांति एवम सद्भावना तथा प्रेम का प्रतीक जाना जाता है। जब इसकी “” गुटर गू ,गुटर गू ” कानों में पड़ती है तों सब समझ जाते है कि ठिठुरती सर्दी की अब विदाई हो चुकी है और सुखदायक गर्मी अपनी चादर फैलाने आ पहुंची है।शायद ही पूरे संसार में यही एक मात्र प्राणी है जो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है सिवाय एक प्राणी को छोड़ कर और श्रीमान वह प्राणी है “” मनुष्य “”! क्यों चौंक गए ना ,और जब में इस लेख के द्वारा कारण बताऊंगा तो निसंदेह ही आपकी धारणा बदल जायेगी बिल्कुल मेरी ही तरह !

             अपनी बैंकिंग सर्विस के 40 वर्षों के अंतर्गत मुझे कई बार ट्रेनिंग हेतु महानगरों में जाना पड़ा है जहां गगनचुंबी विशाल इमारतों के मध्य ,अध्ययन के दौरान मेरी दृष्टि अनायास बड़ी बड़ी शीशे की खिड़कियों पर पड़ती थी , जहां शीशों के दूसरी तरफ अक्सर मेरी दृष्टि रुक जाती थी ,और उसका कारण होता, उन सीलबंद ,अर्ध पारदर्शी शीशों के पार ,मेरी पसंद के प्राणी कबूतरों की चुहल बाजी ! वे अक्सर जोड़े के रूप में एक दूसरे की चोंच से चोंच मिलाते  ,एक दूसरे को धकियाते ,फिर जब एक उड़  जाता तो दूसरा भी पंख फैलाए उसके पीछे पीछे उड़ जाता ,या फिर जब वे वापस आते और अनायास उनकी दृष्टि शीशे में पड़ती अपनी छवि पर पड़ती तो उसे वे अपना साथी अथवा प्रतिद्वंदी समझ चोंच से वार करते ।इसी तरह की वे अजीब अजीब   हरकते करतें रहते ,इस बात से बेखबर कि शीशे के दूसरी ओर कोई उनके इन कार्यकलापों पर अपनी दृष्टि गड़ाए बैठा है । मैं उनकी इन शरारतों को देखते देखते इतना मगन हो जाता कि मुझे ये ध्यान ही नही रहता कि मैं एक लेक्चर सुनने के लिए बैठा हूं ,तब जब लेक्चरर मुझे टोकते तो जैसे मैं एक गहन स्वप्न से जाग उठता।फिर भी वे मुझे इतने अधिक आकर्षित करते कि अपने  लेक्चरों के बीच मैं तिरछी नजरों से उन के विभिन्न कार्य कलापों को ना चाहते हुए भी देखने का लोभ संवरण नही कर पाता था, भले ही इस दौरान मुझे कई बार लेक्चररों की  नाराजगी  भी सहनी पड़ी थी ।

          इसके अलावा कई बार मेरे बचपन में इन कबूतरों के जोड़ों ने घर में अपना घोंसला बनाया था।उस दौरान जब भी मैं इन कबूतर के बच्चो के नन्हे नन्हे बच्चों के कोमल पंखों की फड़फड़ाहट ,उनके मां बाप के उनके लिए दाना पानी लाते देखता तो जैसे इस क्षणों मैं प्रायः सब कुछ भूल जाता।

    ये सारे सुखद अनुभव जब एक त्रासदी जी हां त्रासदी में बदले जब में अपने बेटे के पास पूना आया ।उसका फ्लैट एक बहुमंजिली इमारत में दसवें फ्लोर पर है।उस फ्लैट के दोनों ओर बालकोनी है जिसमें खड़े होकर बाहर देखने पर पूना शहर की हरियाली देखने पर आंखो को बड़ा ही सुकून मिलता था ,इस लिए अपने पूना प्रवास के दौरान में दिन का अधिकांश समय बालकोनी में ही व्यतीत करता था ।पर यह क्या ! इस बार पूना आ कर जब मैं बालकोनी में बैठने के लिए गया तो देखा ,उसके तीनों और एक इंच चौड़ाई के घेरे वाली प्लास्टिक की जाली लगी हुई है। मैने बहुत दिमाग लगाया ये सोचने में कि ये घेराबंदी आखिर किस लिए की गई है ,ये शर्तिया मच्छरों के लिए तो हो ही नही सकती ,क्योंकि इस जाली की चौड़ाई से मच्छर तो क्या कीट पतंगे भी नही रुक सकते ,तो फिर इसके लगाने का क्या कारण हो सकता है।जब सोच सोच कर हार गया ,कोई भी कारण दिमाग में नहीं घुसा तो आखिरकार बेटे से ही पूछना पड़ा ,और जब उसने जो उत्तर दिया तो एक बार तो सुनकर मैं हैरान ही रह गया ।क्या ये भी कारण हो सकता है !!वो बोला पापा ,ये निरीह पक्षी नही ,ये तो पक्के आतंक वादी हैं आतंकवादी !! मेरे हैरानी से ,प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने पर वो बोला कि याद कीजिए ,इस से पहले जब आप पूना आते थे तो इन बालकोनियो में हमेशा कबूतरों की बीट पड़ी रहती थी ,घरेलू काम करने वाली रोज रोज रगड़ के पोंछा लगती ,फिर अगले दिन वही समस्या ,और याद कीजिए कभी कभी तो कबूतर सीधे हॉल में ही आ जाते ,और अगर हम ध्यान नहीं देते तो मौका मिलते ही वे हमारे कमरों के किसी भी कौने में अपना घोंसला बनाने से भी नही चूकते ,इस के अलावा हम तीन चार दिन के लिए कहीं बाहर जाते ,और गलती से अगर कोई खिड़की खुली रह जाती ,और ये कहीं अंडे दे देते तो फिर मुसीबतों की शुरुआत हो जाती ।इतने सीधे पक्षियों के अंडे ,घोंसले सहित हटाने को हमारा दिल नही करता ।तब ये समझिए दो तीन महीने के लिए हमारा जीना मुश्किल हो जाता।क्यों ? वो इस लिए कि उन तीन महीनों में पूरे घर में घोंसलों से गिरते तिनके इधर उधर बिखरते रहते ,कभी कभी तो वो हमारे खाने पीने की वस्तुओं में भी गिर जाते ,अक्सर आते जाते उनके पंख फड़फड़ाने से जहां हमारे कार्य की एकाग्रता में व्यवधान पड़ता वहीं कभी कभी उनके पंख टूटकर इधर उधर पूरे घर में उड़ते रहते ,इसके अतिरिक्त एक बात और अक्सर घोंसलों में से ,अंडों में से निकले नन्हे नन्हे बच्चे नीचे टपक जाते , जिनसे हमारे हृदय दहल जाते।उसके बाद कबूतरों के बैचेनी से फड़फड़ाने से कई दिनों तक हमें रात को नींद भी नहीं आती।ये सब तो फिर भी हम सहन कर लेते ,पर इस दौरान अगर कभी हमें कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ता तो तो इन माता पिता कबूतरों के कारण हमें अपना कार्यक्रम छोड़ना पड़ता।ये सब कभी कभार होता तो चलता ,परंतु ये तो हर वर्ष होने लगा तो हमारे धैर्य की सीमा समाप्त हो गई।कितनी ही बार हम उन कबूतरों को भगाने का प्रयत्न करते परंतु सब निष्फल ,क्योंकि कबूतरों को मनुष्यों के साथ रहने की आदत हो गई थी ! जब बहुत परेशान होने लगे तब एक दिन हमने अपने पड़ोसी से ये कहा कि इस सोसायटी को हम इन कबूतरों के कारण छोड़ने की सोच रहे हैं तो वो हंसने लगा ।कहने लगा ,तुम पूना में कहीं चले जाओ,किसी भी सोसायटी में घर ले लो ,ये तो पूरे पूना में है ,और हम ही नही जब अधिकांश पूना के निवासी मेरे जैसे परेशान होने लगे तो उन सबकी परेशानी देख शहर के एक व्यापारी का दिमाग चला और उसने बाकायदा विज्ञापन देकर हमेशा के लिए एक हल निकाला।जब उनसे संपर्क किया तो उन्होंने जो हल बताया वो अनोखा था।

    मेरे पड़ोसी ने बताया कि देखो मेरे फ्लैट को देखो , मैने क्या उपाय किया है । मैने उन व्यापारी से दोनो बालकोनियो में ये प्लास्टिक की एक इंच चौड़ी जाली तीनों और फिट करवाली है।कुछ दिन तो कबूतर फड़फड़ाते आते ,परंतु जाली के पास आ कर वापस उड़ जाते ।

        बस फिर क्या था ,बेटा बोला , मैने भी बालकोनियो के चारों ओर ये जाली फिट करवादी है।और हां पापा , मैने ही नहीं पूरी सोसायटी ने ये जाली फिट करवादी है।

       पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया ,फिर कुछ दिन बाद मैने अनुभव किया कि अब कबूतरों के झुंड इस सोसायटी से विदा ले चुके है।

           सच कहूं ,आरंभ में तो मुझे बिना कबूतरों कुछ अजीब सा लगा ,उनकी फड़फड़ाहट , उनके  ऊंची ऊंची इमारतों से एक दम नीचे उड़ कर गोता लगाना ,मुझे बहुत पसंद था परंतु अब रोज रोज की बालकनी की सफाई के झंझटों से मुक्ति भी मिल गई थी।

         फिर अचानक टीवी पर एक विदेशी चैनल देखते देखते एक डॉक्यूमेंट्री मैने देखी जो अमेरिका के सबसे बड़े ,सबसे घने बसे ,गगनचुंबी इमारतों के संदर्भ की थी ।उसके अनुसार न्यूयार्क की बहुमंजिली इमारतों को कुछ वर्ष पूर्व इन कबूतरों के झुंड के झुण्डों ने अपनी शरण स्थली बनाली थी ,उनकी आबादी में भी विस्फोटक रूप से बढ़ोतरी हो गई थी ,क्योंकि गगन चुंबी इमारतों के ऊपर रहने वाले इन कबूतरों के कोई भी प्राकृतिक शत्रु जैसे बिल्ली ,कुत्ते आदि नहीं थे ।अपितु इस कारण आसपास के जंगलों से इन कबूतरों का शिकार करने वाले बाज पक्षी भी  शिकार करने के लिए इन इमारतों में आ बसे थे ।जिस से पहले ही परेशान न्यूयार्क के निवासी और अधिक परेशान होने लगे थे।अक्सर कबूतर एवम बाज की छीना झपटी में वे इन गगन चुम्बी इमारतें जो विशाल शीशों से सजी हुई थी उनसे टकराते ,उनमें खरोंच डालते ,उन्हे गंदी करते ।उनकी रोशनी एवम ताजी हवा के लिए जो रोशनदान होते ,उस कारण उन्हें भी समस्याओं से जूझना पड़ता जिनसे मेरा बेटा जूझा था ।तब वहां भी यही जाली लगाई गई ,जिनके कारण काफी हद तक न्यूयार्क निवासियों की परेशानी खत्म हो गई।

    इस के कुछ दिनों पश्चात किन्ही कारणों से मुझे पूना के अस्पताल में जाना पड़ा तो देखा कि इस अस्पताल की सारी बालकनियों में यही जालीदार जाली लगी हुई थी।फिर तो अक्सर पूना भ्रमण के दौरान मेरी दृष्टि अनायास पूना की बहुमंजिली इमारतों पर टिक जाती ,और मैने देखा की अधिकांश इन इमारतों की बालकोनियो में यही जाली लगी हुई थी।अब पूना भ्रमण करते मेरा ये शगल सा बन गया था कि मैं अक्सर पूना के अधिकांश निवासियों से जब इस बाबत बात करता उनमेंसे अधिकांश की राय इन कबूतरों के बारे में यही थी कि ये भोले भाले दिखने वाले पक्षी  उनकी परेशानी की एक बड़ी वजह है।इसके बाद जब मैं दिल्ली की भी अधिकांश गगन चुम्बी इमारतों में रहने वाले परिचितों से जब इन कबूतरों के बारे में उनकी राय जाननी चाही तो मुझे जरा सी भी हैरानी नही हुई ,क्योंकि मैं पूना के अपने अनुभवों से जान चुका था कि आधुनिक समय में ये निरीह से ,शांत दिखाई देने वाले कबूतर ,शांति के दूत नही अपितु ” आतंकवादी है आतंकवादी “” ! !

         पाठको ,शायद मेरी इस बात से   आज आप सहमत ना हों परंतु जब कभी मेरे बेटे ही नहीं ,पूरे पूना शहर के वासियों की तरह आप को इस परेशानी से दो चार होना पड़ेगा तब आप मेरे बेटे की तरह ही अनायास बोल उठेंगे कि ये भोले भाले कबूतर नही ,अपितु ये आतंकवादी हैं आतंकवादी !

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