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    यात्रा ………तुलजा भवानी..!!

    भाग ……….दो

             शोलापुर शहर की सीमा समाप्त होते होते शाम के साढ़े चार के लगभग समय हो गया।हमारा पूर्व का कार्यक्रम कि हम रात्रि नौ बजे तक वापस पूना घर लोट आयेंगे ,इस शोलापुर के चक्कर में ध्वस्त हो गया, था। खैर , अब हम तेजी से तुलजा भवानी की ओर बढ़े जा रहे थे ! वहां पहुंचते पहुंचते शाम के छः बज गए ।हमारी आशा के विपरीत तुलजा भवानी काफी बड़ा शहर दिखाई दिया ।हम गुगल मैप की सहायता से ऐन तुलजा मंदिर के सामने के मार्ग पर जा पहुंचे ।शाम का झुटपुटा, अंधेरों में बदलने लगा था ।तभी हमारी कार को दो गार्डों ने रोक दिया ।कारण पूछने पर बोले ” पार्किंग के पचास रुपए दीजिए ,” हमने कहा पार्किंग किधर है तो बोले आगे कहीं भी कार खड़ी करदीजिए ।हम हैरान हुए ,सामने एक संकरा सा बाजार था जैसा कि प्रायः धार्मिक शहरों में होता है।हमारे ये कहने पर कि सामने पार्किंग तो दिखाई ही नहीं दे रही ,ये तो बाजार है ,हम रुपए नही देंगे ,तो बोले फिर आप अंदर प्रवेश नही कर सकते ।अब इस जबरदस्ती की वसूली से निराश होते हुए आखिर कार रुपए देने ही पड़े, क्योंकि हम लोकल नही थे। खैर , कार आगे बढ़ाई तो पार्किंग का कोई स्थान ही नहीं था ,आखिर कार एक दुकान के आगे रोकी और दुकानदार के चिक चिक करने के बावजूद हम कार खड़ी कर के आगे बढ़ गए !

          लगभग तीन सौ मीटर संकरे ,व्यस्त ,धार्मिक पूजा पाठ ,प्रसाद से भरी दुकानों से होते हुए आगे बढ़े कि अचानक संकरे मार्ग के अंत में एक बड़ा खुला प्रांगण आ गया ,जिसके तीन ओर धार्मिक सामग्रियों से भरी दुकानें थी ,तथा ठीक सामने किले नुमा मंदिर का विशाल दरवाजा था जो रंग बिरंगी लाइटों से चमक रहा था ।उसके ठीक बगल में तीन मंजिला एक विशाल आधुनिक होटल नुमा इमारत थी ,उस के ठीक नीचे तलघर में एक ढलान दार दरवाजा था जहां मराठी भाषा में कई सारे बोर्ड लगे हुए थे ।अब भाषा से अनभिज्ञ होते हुएं,जब किले नुमा विशाल दरवाजे के पास अंदर प्रवेश करने हेतु पहुंचे तो फिर मंदिर के गार्डों ने रोक दिया ।वे मराठी में कुछ कह  रहे थे ,और हम अनपढ़ों की तरह उन्हें देख रहे थे,हमारी समझ में कुछ नही आ रहा था,जबकि तमाम सारे दर्शनार्थी उसके अंदर प्रवेश कर रहे थे ।दरवाजे के सामने विशाल प्रांगण ,ढेर सारे यात्रियों से लबालब भरा था ।तभी हमारे सामने कई सारे धोती कुर्ता पहने पंडित पुजारी आ गए ,और हिंदी में कहने लगे ,पहले होटल नुमा इमारत के तलघर में जा कर यात्रा पास लेकर आइए जो कि एकदम मुफ्त है ।हमारी हैरानी की सीमा ही नही थी कि भाई ,अगर प्रवेश मुफ्त है तो किस बात का मुफ्त कार्ड ! मैं भारत के लगभग उत्तर से लेकर धुर दक्षिण तक प्रत्येक धार्मिक ,ऐतिहासिक एवम अन्य प्रकार के कई स्थानों में जा चुका हूं और प्रत्येक जगह टिकट के लिए ही लाइन लगती थी परंतु यहां मुफ्त के लिए ही लाइन लग रही है । 

            भारी भीड़ ,लंबी लंबी लाइनें देख हमने फिर पूछा कि क्या कोई शुल्क देकर मंदिर जो कि एक विशाल किले जैसा ही था ,में प्रवेश लिया जा सकता है तो बोले हां ,और फिर एक ओर ओर संकेत किया।तभी वे सारे बोल उठे ,अरे हम आपको सीधे दर्शन करा देंगे ,पूजा भी करा देंगे ,बस आप पांच सौ रुपए दे दें ! मैं हमेशा ऐसे पंडो के विरुद्ध रहा  हूं ,इस लिए उन्हें इनकार करके शुल्क वाली खिड़की की ओर चल दिया ,लेकिन ये क्या! वो तो बंद थी ,पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि शुल्क वाले दर्शन केवल शाम छः बजे तक ही हो सकते हैं ,तो अब हमारे पास दो ही मार्ग थे ,या तो उन पंडे पुजारियों के साथ प्रवेश करें  अथवा मुफ्त की टिकट हेतु लंबी पंक्ति में खड़े होना, और हमने पंक्ति में खड़े होना ही चुना ! ! 

          काफी देर बाद जब हमारा नंबर आया तो खिड़की के अंदर से कहा गया ,थोड़ा सामने इस एंगल में खड़े होइए,हम आपकी सामने लगे कैमरे से फोटो खींचेंगे ,उसके बाद उन्होंने हमारा मोबाइल नंबर पूछा फिर एक बड़ा सा कार्ड हमे दे दिया ,जिस पर छोटे छोटे ढेर सारे ,कंप्यूटर की कोड भाषा में लिखी पर्चियां चुपकी हुई थी,परंतु हमारी खींची फोटो लगी ही नहीं थी ।कार्ड देख कर प्रतीत हो गया था कि इसका प्रयोग कई बार हो चुका है क्योंकि एक तो वो पुराना था ,दूसरे पुरानी कई पर्चियां उस पर चुपकी हुई थी ! खैर ,कार्ड लेकर हम दरवाजे पर पहुंचे तो हमारा कार्ड हम से ले लिया गया , और हम अंदर प्रवेश कर गए ।

              मंदिर के विशाल किलेनुमा दरवाजे के अंदर जैसे ही हमने प्रवेश किया ,हमे समझ में आ गया ये  किले नुमा नही ,वास्तव में एक विशाल किले का विशाल दरवाजा है।ठीक इसके बाद चौड़ी चौड़ी सीढियां सीधे नीचे लगभग दस मीटर तक उतर रही थी ।जगह जगह सुरक्षा के लिए केमरे लगे हुए थे ,साथ ही थोड़ी थोड़ी दूर पर सुरक्षा कर्मचारी खड़े हुए थे ।स्पष्ट था कि ये मंदिर एक विशाल किले का ही भाग है ,और उसका प्रत्येक निर्माण किले के अनुसार ही बनाया गया था।नीचे उतरते ही यात्रियों के मार्ग दर्शन के लिए   बोर्ड लगे हुए थे ।हैरानी की बात थी की इतनी शाम को भी पूरा मंदिर ,नही नही पूरा किला यात्रियों से भरा हुआ था परंतु वे वास्तव में दर्शनार्थी ही थे ,यात्री नही जो केवल किले को देखने आए है।दर्शनार्थियों में बच्चे ,बूढ़े ,जवान ,महिलाए जो पारंपरिक साड़ी में थी ,वापस आते यात्रियों के समूह जिनके हाथों में पूजा की थालियां ,माथे पर बड़े बड़े टिके ,तिलक लगे हुए एक अलग ही दृश्य पैदा कर रहे थे ।एक बात और ,शायद इन यात्रियों में हमें छोड़ कर लगभग सभी महाराष्ट्रीयन ही थे ,ये स्पष्ट था।बाईं तरफ कुछ सीढियां जा रही थी और लगभग सभी यात्री उनके ऊपर पंक्ति बनाए धीरे धीरे सरक रहे थे।सुरक्षा कर्मी जो शायद हमारी हिंदी में बोलने के कारण कुछ विशेष सहयोग दे रहे थे ,ने बताया कि ये मार्ग नीचे बने एक तालाब की ओर जा रहा है जहां सारे यात्री माता तुलजा भवानी के दर्शनों से पहले तालाब में हाथ मुंह धोते है।अब इतनी भीड़ देख कर ,साथ ही हम तो केवल पर्यटन एक थोड़ी सी ही श्रद्धा होने के कारण उधर न जा कर सीधे आगे बढ़ गए।हमारे चारों ओर बड़े बड़े गलियारे ,जिनमे छोटी बड़ी कोठरियां बनी थी ,जिनमे कुछ ही में मंदिर संबंधी कार्यालय बने हुए थे।

            थोड़ा आगे बढ़ते ही पुनः काफी नीचे उतरने के लिए बड़ी बड़ी सीढियां दिखाई दी।एक बात और ,किले की विशाल दीवारें ,परकोटे ,,कोठरियां ,सब के सब बड़े बड़े आयताकार पथरों से निर्मित थे ,जिनका रंग समय की मार के कारण काला ,भूरा हो चुका था परंतु आधुनिक काल में उनका रंग ,बड़ी बड़ी ,रंग बिरंगी ,झिलमिलाती लाइटों के कारण दब सा गया था। फिर भी किले की प्राचीनता ,विशालता , हमें ये अहसास दिलाने लगी थी कि हम बीसवीं ,नही ,पंद्रहवीं शताब्दी के शिवाजी काल में थे।इसकी प्राचीनता में इतना अधिक आकर्षण था कि हम उसमें शायद डूबते ,उतरते से लग रहे थे ।इसी आकर्षण में समाते ,धीरे धीरे भीड़ का अंश बनते बनाते, कभी  बाएं ,कभी दाएं ,ऊपर नीचे चलते ,कई अन्य विशाल परकोटे से निकलते आखिर कार ठीक मध्य में निर्मित एक विशाल पत्थरों से निर्मित मंदिर के जो की अपने चारों ओर लगी हुई दर्शनार्थियों की , पंक्तियों से सराबोर ,पूजा ,गायन के स्वरों से गूंजते  ,सामने पहुंच गए ।उसके चारों ओर निर्मित छोटे खुले बरामदे नुमा अनेकों कोठरियां ,जिनमे अधिकांश में पंडे पुजारी ,पूजन सामग्री से ,प्रत्येक यात्री को मराठी भाषा में बुलाते दृष्टिगोचर हो रहे थे ।चारों ओर छोटी बड़ी टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिनमे माता तुलजा भवानी की काले रंग के पत्थर  से बनी ,फूल मालाओं से सजी ,बड़े से मुकुट पहने दिखाई दे रही थी।इस मंदिर के चारों ओर बुजुर्ग ,महिलाए ,बच्चे जो शायद भीड़ के दवाब के कारण, तो कुछ हम जैसे इतनी भीड़ को देख कर दर्शन करें या नही ,इसी सोच विचार में डूबे हुए बैठे थे ।किशोर लड़के लड़कियां सब ओर से बेपरवाह अपनी दुनिया में मस्त ,मोबाइल से सेल्फी लेते इधर उधर घूम रहे थे ।इतनी अधिक भीड़ को देख कर हमारे हौंसले पस्त से हो रहे थे ।

                अनेकों सुरक्षा कर्मियों से जल्दी दर्शन करने का अनुरोध जब व्यर्थ हो गया तो हम पंडे पुजारियों की शरण में जाने को विवश हो गए ।”” पांच सौ रुपए लगेंगे ,हम आपकी पूजा करा देंगे “” स्पष्ट था कि वो दर्शन कराने का , सरल मार्ग भी बताने को तैयार थे।अब ये सब तो आप जानते ही हैं कि उत्तर भारत के लगभग प्रत्येक मंदिर में भारी भीड़ में यही व्यवस्था ,दर्शनों की सहूलियत प्रदान करती है ,अतः पांच सौ नकद दे कर ,पूजा का आडंबर जिसमे माथे पर तिलक लगाने से लेकर पूजा की थाली में पूजन सामग्री  शामिल थी ,वे हमे सुरक्षा गार्ड के कानों में गुप्त मंत्र फूंक कर ,अपेक्षाकृत एक छोटे मार्ग से ,ठीक मुख्य मूर्ति के आगे लगी पंक्ति में शामिल करके ,कुछ ही मिनटों में देवी तुलजा भवानी की मूर्ति के समक्ष खड़ा कर गए ।अब देवी तुलजा भवानी की मूर्ति को जब तक हम निहारते कि बगल में खड़े सुरक्षा कर्मियों ने हमे बाहर जाने का संकेत ही नहीं किया ,अपितु एक तरह से बाहर की ओर धकेल सा ही दिया।फिर भी एक विशेष संतोष का भाव लिए कि हमने दस मिनट के अंदर अपनी अभीष्ट यात्रा को देवी तुलजा भवानी के दर्शन करने में सफल बना लिया, जिसके लिए हम सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से आए थे।देवी के दर्शनों के पश्चात हमने परंपरा के अनुसार मंदिर की परिक्रमा लगाना आरंभ किया ।परिक्रमा बहुत छोटी ही थी परंतु दर्शनार्थियों से खचाखच भरी हुई थी ।पूरा प्रांगण ,सजावटी लाइटों से जगमग था ,ऊपर से गर्मी भी काफी थी ।परिक्रमा लगाते हुए अचानक हमारी दृष्टि ठीक मंदिर के पीछे वाले भाग पर एक अपेक्षाकृत छोटे से बरामदे पर रुक गई जो यात्रियों से पूरा भरा  हुआ था ,लेकिन उस बरामदे के ऊपर लगे एक बड़े से पोस्टर ने जैसे हमारे कदम रोक दिए ।उस पोस्टर में शिवाजी महाराज अपने दोनो हाथ एक देवी की ओर बढ़ाए हुए हैं उधर आकाश में  देवी हवा में ही अपने दोनो हाथों में एक तलवार थामे हुए जैसे शिवाजी को सौंप रही है ।हमे समझते हुए देर नही लगी कि ये तुलजा भवानी है जो अपने नाम की प्रसिद्ध देवीय तलवार शिवाजी को सौंप रही है ,और तब इस पोस्टर के ठीक नीचे जमा भीड़ के कारण जानने को हम भी पीछे जा खड़े हुए ।

                बड़ी कठिनाई,धक्के मुक्की के बाद हम जब और अंदर की बढ़े तो देखा कि मंदिर के पीछे की दीवार पर लगे पोस्टर के नीचे थोड़ा सा आगे बढ़े चबूतरे पर एक आदमी लोगों से पैसे ले रहा है ,और फिर चबूतरे पर रखे गोल से ,अनगढ़  पत्थर पर उस पैसे देने वाले दर्शनार्थी से अपने दोनो हाथ ,पत्थर के बाएं ,दाएं रखवाकर कुछ कह रहा है।हम नासमझ से बने ये सब देख रहे थे ,भाषा से अनभिज्ञ होने के कारण वैसे कुछ समझ तो नही आ रहा था ,तभी गौर किया कि कुछ लोगों के हाथ रखने पर वो बड़ा सा गोल पत्थर कभी दाएं घूमता या कभी बाएं घूमता या फिर कभी कभी घूमता ही नही था।ये kotuk देख पत्थर घुमाने हेतु लगी भीड़ से हम भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके ।किसी तरह जब हमारा नंबर भी आया तो चबूतरे पर बैठे आदमी ने हमसे कुछ कहा ।हमारे उस से हिंदी में बोलने पर उसने बताया कि आप प्रत्येक प्रश्न पूछने के दस रुपए देने पर ,इस पत्थर पर अपने दोनो हाथ रखो और मन ही मन  कोई प्रश्न पूछो।अगर पत्थर बाएं की ओर घूमेगा तो नही में उत्तर समझो और अगर दाएं और घूमेगा तो हां में उत्तर होगा।हमने तुरंत दस का सिक्का उसे सौंपा ,और उसके बताए हुए तरीके से दोनो हाथ पत्थर पर रखे ।परंतु यह क्या ! पत्थर ना बाएं घुमा ना ही दाएं ! उसने जाने मराठी में क्या कहा ,और हमसे जाने के लिए कहा।अब अपनी संतुष्टि के लिए हमने फिर दस का सिक्का उसे दिया और वही क्रिया फिर दोहराई ।परंतु पहले की तरह पत्थर को ना तो घूमना था और न ही घुमा ।हम वापस मुड़े और दिल को ये तस्सली दी कि शायद ये पत्थर भी अन्य की तरह केवल मराठी भाषा ही समझता होगा ,और वापस परिक्रमा पूरी करने में लग गए ! !

           वापसी में मुख्य दरवाजे तक वापस आने में चढ़ी सीधी सीढियौ ने जैसे हमारी बची खुची धैर्य की परीक्षा लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी ,हम भक्ति भाव से अधिक ,शिवाजी महाराज की कुलदेवी से साक्षात रूबरू होने के संतोष से ,इन सब कष्टों को विस्मृत कर आखिरकार मंदिर के बाहर खुले प्रांगण में आ पहुंचे ।

        उस प्रांगण में, समीप ही बनी पत्थरों से ही बने दीवारों पर बैठ कर अपना पसीना  सुखा कर,कुछ देर  थकान मिटाई ,फिर वापसी के लिए उसी संकरे ,पूजा की सामग्रियों से भरे बाजार से होते हुए अपनी कार तक पहुंचे , जहां सामने का दुकानदार आग्नेय नेत्रों से जैसे हमे भस्म करने के लिए  तत्पर दिख रहा था।बिना उसकी ओर देखे हम चुपचाप अपनी कार मोड़ कर वापस पूना जाने के लिए मुख्य मार्ग की ओर बढ़ चले !

           शायद मैं इस यात्रा के विवरण को यहीं विराम दे देता ,अगर वापसी में एक दुर्घटना से हम बाल बाल ना बचे होते।मुख्य मार्ग तक आते आते रात्रि के नौ बज चुके थे ।देरी एवम थकान से सराबोर होते हुए भी चालक के रूप में बैठे अपने बेटे को धीरे धीरे चलने एवम घर पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है ,कहते हुए स्वयं भी अंधेरे में पूरी तरह डूबी , विरान सी सड़क पर सामने दृष्टि गड़ाए चेतन्यता से बैठे थे ।अभी हम इस शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर पहुंचे थे कि अचानक एक स्कूटी सवार तेजी से हमें ओवरटेक करता हुआ ,सड़क के ठीक बीच मैं आ  गया ।हम उसकी इस तेजी को देख हैरान होते हुए  चालक सीट पर बैठे अपने बेटे से बोले,इसे शायद बहुत जल्दी है ,तुम थोड़ी स्पीड कम कर लो ,इसे जाने दो ,तो बेटे ने जैसे ही कार की स्पीड कम ही की थी कि स्कूटी सवार तीव्र गति से चलते हुए कभी एक दम सड़क के बाएं किनारे तो कभी दाएं किनारे ,अपनी स्कूटी को लहराते हुए चलने लगा ।इसे देख मेरे बेटे ने स्पीड और कम करली  ,जिस से उस स्कूटी सवार और हमारी कार के मध्य फैसला कुछ और कम ही  हुआ था कि अचानक वह स्कूटी सवार ,अपनी स्कूटी को लहराते हुए ठीक एक दम बाएं किनारे पर आ पहुंचा ,और इस से पहले कि हम कुछ समझ पाते ,हालांकि तब तक हम ये समझ चुके थे कि स्कूटी सवार नशे में धुत था ,किनारे चलते एक साइकल सवार से पीछे से जोरदार ढंग से जा टकराया !अगले ही पल दोनो सवार हमारी धीमी गति कार के सामने बीच सड़क पर ढेर हो गए ।उन दोनो के मध्य स्कूटी सवार की तेज स्पीड होने के कारण टक्कर भयंकर ही हुई थी।वो तो बेटा कुछ ही क्षण पूर्व सावधान हो चुका था इस लिए उसने कार को तेजी से बाईं ओर काट ली ,और आपस में टकराने के बाद सड़क पर ढेर हुए दोनो सवारों से बाल बाल बचतें हुए आगे बढ़ गया ।उस क्षण जैसे हमारी सांस रुक ही गई थी ।अनजान प्रदेश ,रात्रि का समय होने के कारण ना चाहते हुए भी हम नही रुके और अपनी मंजिल ,पूना शहर की ओर पांच घंटे बाद मध्य रात्रि को पहुंच कर ही दम लिया।शेष रात्रि हमारे थकान से सराबोर होने के बावजूद,, भी उस संभावित दुर्घटना से बाल बाल बचने के सदमे के कारण जागरण में ही कटी।फिर भी एक संतोष हृदय में था कि आखिरकार हमने शिवाजी महाराज की महत्व पूर्ण घटना के गवाह ,प्रतीकों को अपनी आंखों से देख आए थे !!

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