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    चित्रकूट यात्रा का पहला दिन : मंदाकानी नदी के घाट

         

    पिछले पोस्ट से आगे बड़ते हैं। सुबह जब हम उठे तो हमारी थकान एक दम गायब हो चुकी थी।कमरे की खिड़की से बाहर झांका तो हम आश्चर्य चकित रह गए ।सामने मंडाकानी नदी ,नदी  के सामने वाले किनारों पर स्नार्थियों की भीड़,सब तरह की चहल पहल ,मंदिरों में पूजा पाठ ,घंटियों के हल्के हल्के स्वर ,हमारे आश्रम से लेकर चारों ओर छाई हरियाली एक अलग ही नजारा प्रस्तुत कर रही थी।हम दोनो कमरे से बाहर खुले मैदान में आए तो आसपास लगे फूल इसे असीम सौंदर्य प्रदान कर रहे थे।आश्रम बहुत ही बड़ा था ,पूरे चार मंजिला भवन जिसमे पचास से अधिक कमरे ,पूरी तरह से आधुनिक बने ,आश्रम के आचार्यों एवम पूजा घरों की अलग व्यवस्था ,बहुत ही भव्य आश्रम था ये।सब ओर एक अलग सी शांति,रौनक वातावरण में  प्रदान कर रही थी।हमने ये भी अनुभव किया कि इतने बड़े आश्रम में हम ही अकेले यात्री थे।बाद में बात करने पर हमे बताया गया था कि अयोध्या में भी इसी आश्रम की एक शाखा है जिसमे यहां के प्रधान आचार्य एक विशेष समारोह की अध्यक्षता कर रहे है इसीलिए ये आश्रम एक दम खाली है,साथ ही बताया कि हरिद्वार में भी इनका एक आश्रम बना हुआ है।

    अभी हम चित्रकूट की इस शांति का आनंद उठा ही रहे थे कि भोपाल से साढू भाई का फोन आ गया ।हमसे उन्होंने “व्यवस्था कैसी रही” पूछा तो हमने उनको रात्रि की सभी परेशानियों को बताया साथ ही इतनी बढ़िया  व्यवस्था करने के लिए आभार प्रगट किया तो उनके जवाब ने हमें चौंका दिया ।कहने लगे देर रात्रि को जब आपका फोन आया तो आपकी श्रीमती जी हमारे घर पर ही थीं ! अब फोन पर आपका जिक्र होते ही उन्होंने आपके बारे में पूछ ही लिया कि क्या उनसे बात हो रही है।इनकार की कोई गुंजाइश ही नहीं थी ,इस लिए आपकी इस यात्रा के बारे में बताना पड़ा ।

    क्या ! मैं तो चौंक पड़ा ।” अरे आपने सब गुड गोबर कर दिया ” कहना तो मैं साढू भाई से यही कहना चाहा था परंतु तुरंत सोचा ,कहीं वे भी इनके पास ही बैठी हमारी बात सुन रही होंगी ।फोन बंद कर जे पी भाई से सलाह ली कि अब क्या करूं ,दो दिन बाद मथुरा भी जाना है ,तो जे पी भाई का सीधा उत्तर था ,आप अभी भाभी जी को फोन करें और कहें कि तुम अभी तक चित्र कूट धाम नही आई हो तो मेरे द्वारा भगवान श्री राम ने आपको यह सुअवसर दिया है ,अब आप भी तुरंत भोपाल से रात की ट्रेन पकड़ ,सीधे चित्रकूट आजाओ ,फिर यहीं से वापस मथुरा चले चलेंगें , कार तो खाली है ही,निश्चय मानिए वे इस से प्रभावित हो ,सब भूल कर उल्टा आपको धन्य वाद ही देंगी ! ! !  ” जे पी भाई,वास्तव में आप जीनियस हो ,कह कर हमने उन्हें गले लगा लिया । 

     

    अब हम दुकान पर बैठे नाश्ता करते रहे और भोपाल फोन करने की हिम्मत जुटाते रहे ,फिर कोई अन्य उपाय नहीं होने के कारण सीधे उन्हें फोन कर ही डाला और चित्रकूट आने को कह दिया।अब ये कोई बात बताने की तो है नही कि इस के अलावा उनसे फोन पर क्या वार्तालाप हुआ होगा !!आशा के अनुसार “आशाजी ” हमारी श्रीमती जी का नाम यही है ना ,तो कल सुबह चित्रकूट आने को मान गईं !

     हम अब सारी चिंताएं छोड़ चित्रकूट धाम का आनंद लेने को निकल पड़े।सब से पहले धाम में बहती मंडकानी नदी में डुबकी लगाई ,जी हां ,डुबकी ,क्योंकि नहाते हुए पता चला कि अन्य बरसाती नदियों की तरह इसमें केवल वर्षा ऋतु में ही पानी बहता है । वर्ष के अन्य समय इसके जल को समीप ही बांध बना कर यात्रियों के लिए स्नान की सुविधा प्रदान करते है।

     

    अब ये तो यहां आकर ही समझ आएगा की इस छोटे से शहर की छोटी सी नदी में कितना पानी होगा।इस आधा किलोमीटर लंबे ,सौ फुट चौड़ी नदी में ,अनेकों नावें ,सैकडो यात्रियों , साधू संन्यासियों के स्नान करते रहने के कारण एवम अन्य कारणों के कारण जल कैसा होगा परंतु चूंकि हम मथुरा के निवासी हैं तो ये तो मानना पड़ा की यमुना से इस नदी का जल फिर भी बहुत ठीक हैं,नहाने लायक भी है। हां ,नहाते समय नदी के अंदर मछलियों के पैरों की उंगलियों को गुदगुदाना एक अलग ही अनुभव था।

         स्नान के पश्चात इस के किनारे बड़े से पक्के घाट पर घूमने निकले तो एक जगह एक गोल मंदिर नुमा छोटी सी इमारत बनी थी जिसके साथ एक बोर्ड लगा था कि यहीं पर बैठ कर तुलसीदास जी ने महान धार्मिक ग्रंथ ” रामायण ” की रचना की थी।कहते तो ये भी हैं की यहीं पर उन्हें भगवान रामचन्द्र जी दर्शन भी हुए थे।हमने भी इस स्थान से अपने माथे को लगाया और आगे बढ़ गए।

       

     

     घाट के किनारे कई बड़े बड़े मंदिर एवम आश्रम भी बने है जिनमे आगंतुक पूजा पाठ करते है साथ ही निवास भी करते है।   

     

    चूंकि कल सुबह श्रीमती जी भी आने वाली थी तो हमने निर्णय किया कि चित्रकूट से बाहर के दर्शनीय स्थल तो कल उनके साथ ही घूमेंगे ,आज तो हम सिर्फ लोकल शहर ही घूमेंगे।

     

    जैसे की पहले बताया था कि शहर तो एक दम छोटा सा ही है ,कुछ मंदिरों को छोड़ ,पूरा शहर घूमने में एक आध घंटा ही लगता है तो हम लोकल ही घूम कर ,दोपहर का भोजन कर वापस अपने निवास स्थान पर आ गए , कमरे में लगे ” ऐसी ” की शीतलता में , जे पी भाई तुरंत बीते कल की बची खुची थकान उतारने बिस्तर पर ढेर हो गए ,परंतु हम आने वाले कल का ,घूमने का प्रोग्राम बनाने के , साथ ही श्रीमती से सामना होने पर कैसे बर्ताव होगा ,की चिंता फिक्र में पलंग पर करवट ही बदलते रहे !

           

     

    शाम ,जब सूर्य देव के तेवर थोड़े नरम पड़े तो हम दोनो थोड़ा आस पास घूमने कार से निकल पड़े।बस ऐसे ही समय बिता ,घाट किनारे लगी कुर्सियों पर बैठ, कुछ चहल पहल ,कुछ रामायण काल की बीती घटनाओं को याद कर ,  कल्पनाओं में डूब समय बिताते रहे।

         शाम के जैसे ही सात बजे ,अचानक घाट के दोनो किनारों पर रौनक बढ़ने लगी।देखा ,घाट के ठीक बीच ,एक विशेष चबूतरा बना हुआ है ,इस पर शाम की आरती के लिए बड़े बड़े दीपक ,मालाएं अन्य पूजा में प्रयोग हो ने वाली सामग्री आने लगी।सफाई कर्मचारी पूरे घाट की सफाई धुलाई में व्यस्त हो गए।तभी नदी में खड़ी अनेकों नावों की चहल पहल भी बढ़ने लगी।नावो को देख हम हैरान रह गए ,दिन में तो ये बेरोनक सी खड़ी थी ,परंतु शाम होते ही ये अनेकों प्रकार की बिजली के झालरों से जगमगाने लगी ,अरे वाह , हर नाव में इन्वेटर लगा था ।यात्रियों को लुभाने

     का उनका ये प्रयास इतना अधिक सफल था कि हम भी अपने को रोक नहीं सके और मोल भाव करके एक नाव में जा बैठे।

         

     अब बिजली से जगमगाती नाव में ,जो कि चित्रकूट की एक विशेषता थी हम नदी में इधर से उधर घूमते रहे , और घाट के दोनो ओर हो रही आरती का आनंद लेते रहे।वास्तव में रात्रि के अंधकार में ,चमकते चंद्रमा के सानिध्य में ,सामने झिलमिलाती ,इधर उधर घूमती नावें ,बड़े बड़े दीपक , शंखों ,घंटियों की आवाजे जैसे हमे सम्मोहित कर एक अलग ही दुनिया में ले जा रहे  थे।लगभग एक घंटे के बाद ,आरती समाप्त होते ही हम भी अन्य यात्रियों की तरह भोजन के लिए मन पसंद भोजनालयों में चले गए।इन सब कार्यों में रात के नौ बज चुके थे ,शाम के समय चहल पहल से भरा घाट,अब नीरव सन्नाटे में डूब चु

    का था। हम घूमते फिरते अपने निवास स्थान पर वापस आ गए।कमरे में कुछ देर दोनो ने कल की यात्रा के बारे में बातचीत की और बत्ती बुझ सो गए।

       सुबह हमारी नींद फोन की घंटी से खुली ,देखा तो श्रीमती जी का ही था।उन्होंने कहा कि वे चित्रकूट स्टेशन पहुंचने ही वाली है ,बस जे पी को सोता छोड़ , कार निकाल , मैं स्टेशन पहुंचा तो ट्रेन प्रवेश कर रही थी।जब वो डिब्बे से उतरीं तो एक और आश्चर्य से मेरा सामना हुआ जिस से सच बताऊं ,मुझे बड़ी राहत मिली।उनके साथ हमारी भोपाल वाली साली साहिबा भी आईं थी।बिना समय गवाएं किए ,तुरंत उन्हे कार में बिठाया ,सीधे कमरे में पहुंचा। तब तक जे पी भाई भी उठ चुके थे।रस्मी बात चीत के बाद हमने उन्हें दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया।आज का प्रोग्राम कल ही बना लिया था , जिसमे सबसे पहले नदी में स्नान ही था सो नदी में स्नान किया ,उसके बाद जलपान के लिए रेस्टोरेंट पहुंचे , और इस दौरान जे पी भाई श्रीमती जी को ये  समझाने में सफल हो चुके थे कि ऋषि भाई के द्वारा ही आप दोनो को श्री राम जी के इस पवित्र तीर्थ स्थान पर आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है !!

           

      अब कार निकाल और हम चल पड़े यहां से तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित गोदावरी नदी के उद्गम स्थल जो की  एक गुफा से निकलती है ,जिसके लिए पचास फुट तक घुटनों तक पानी में चलकर जाना होता है।

     

    अंदर पहुंच कर गुफा दो भागों में बंट जाती है और दोनो ओर गहरे अंधेरे में विद्युत बल्बों की रोशनी में यात्री इसके अंत में बने बड़े से गलियारे में पहुंच कर अचंभित रह जाते हैं।ये इतने बड़े हैं कि इनमे सैकड़ों लोग आराम से खड़े हो सकते है ,जिस के बारे में कई कथा कहानियां श्री राम जी से संबंधित होती है ,गुफा के दूसरे गलियारे के अंत में एक बहुत ही छोटा सा सरोवर है जिसके एक किनारे राम परिवार की मूर्तियां हैं जिनमे पुजारियों द्वारा यात्रियों को पूजा पाठ कराते हैं।

    आज से बीस वर्ष पूर्व जब पहली बार मैं यहां आया था तो यात्रियों की संख्या थोड़ी ही रहती थी ,परंतु गुफा के आरंभ में हम यह देख अचंभित रह गए कि इतने खराब ,उमस ,गर्मी भरे मौसम में सैकड़ों यात्री पंक्ति लगाए खड़े थे ।

     

    एक बात और इन गुफाओं में प्रवेश करने के लिए दोनो तरफ सौ से ज्यादा सीढियां बनी हुई है ,जिनमे टिकट ले कर ,यात्री पंक्ति लगा कर सीढिया के द्वारा तेज चढ़ाई चढ़ कर अत्यंत संकरे गुफा के प्रवेश द्वार पर पहुंचते है , जहां से थोड़े थोड़े अंतराल पर यात्रियों के दल अंदर प्रवेश करते रहते हैं।

     

    जब हम चारों का गुफा में प्रवेश करने का नंबर आया तो घुटने घटने पानी ,संकरा मार्ग ,सैकड़ों की भीड़ ,खूब सारे पंखे लगे होने के बाद भी कुछ ही मिनटों में हमें इतनी बैचेनी होने लगी कि वर्णन करना मुश्किल है।गुफा के एक मुहाने तक जाते जाते ,हम पसीने से तरबतर हो गए और सब कुछ छोड़ ,  हर हालत में गुफा से बाहर आने को मजबूर हो गए ,मन ही मन भगवान से क्षमा प्रार्थना की , और जैसे तैसे गुफा से बाहर निकल आए ,।बाहर आकर गुफा के बाहर लगी अनेकों छोटी मोटी दुकानों में से एक नींबू के शरबत बनाने वाली पर बैठ ,गले के साथ साथ मन भी तर किया ।कुछ राहत मिली तो ओरछा की ही तरह कार के ” ऐसी ” की शरण में जा कर ही चैन लिया ! 

       

     

    इसके बाद वहां से इतनी ही दूरी पर स्थित माता सती अनुसूया के आश्रम , जहां कथाओं के अनुसार त्रिदेवताओं को सती जी ने बालक रूप दिया था ,की और चल पड़े ।ये आश्रम घने ,मनोरम जंगलों के ठीक मध्य में है ,इस आश्रम के सामने से ही ,चित्रकूट में बहने वाली नदी मंदाकिनी भी पर्वतों की गोद से निकल बाहर आती है।

         

     जब हम इस आश्रम की ओर मुख्य सड़क से मुड़े तो इस मार्ग के दोनो ओर छाई सघन हरियाली ने जैसे  हमारी थोड़ी देर पहले की मौसम की परेशानी एक दम दूर कर दी।हम अब ये समझ चुके थे ये समूर्ण स्थान अगर आज भी इतना मनोरम है तो आज से सात हजार वर्ष पूर्व तो इस से भी अधिक मनोरम ,अद्भुत रहा होगा ,जिसके कारण श्री राम ने अपने वनवास के चौदह वर्षों में से साढ़े ग्यारह वर्ष , यहीं कहीं “” प्रण कुटी “” बनाकर ,प्रवास करने का निश्चय किया होगा ।

    इस पर्वतीय मार्ग के एक और जहां हरियाली से भरे पूरे पर्वत , वन थे ,तो दूसरी ओर मंद मंद गति से बहती मंडाकानी नदी भी एक अपूर्व सौंदर्य की साक्षी बन रही थी ।तभी सड़क के एक तरफ एक बोर्ड दिखाई दिया ,जिस पर लिखा था ,यही वो स्थान है जहां पर ,कभी कभी श्री राम ,पास बहती नदी के किनारे एक चौड़ी सी,पीले से रंग की ,चमकदार ,चिकने पत्थर की “” स्फटिक “” शीला पर बैठा करते थे , और अनुज श्री लक्ष्मण द्वारा लाए गए आसपास के जंगली पुष्पों से माता जानकी जी के सिंगार हेतु, पुष्पों से माला आदि श्रृंगार एवम पूजा के लिए सामग्री बनाते थे।हमने तुरंत कार एक तरफ की ,ओर नीचे इस शिला की ओर चल दिए।वास्तव में सच्चाई कुछ भी रही हो ,ये शिला ,ये नदी ,आसपास के घने वन,ऊपर से मन ,मस्तिष्क में उमड़ते घुमड़ते ,विचारों,कथाओं से हम एक अलग दुनिया में विचरण करने लगे थे।पूरा वातावरण एक अलौकिक दुनिया का आभास प्रदान कर रहा था।इस निस्तब्ध करने वाली शांति को अगर कभी कभी कोई भंग कर रहा था तो वो आते जाते यात्री एवम उनकी पूजा पाठ कराते एक पुजारी जी !हमे ज्ञात नही कि हम चारों भी कितनी देर तक इस वातावरण के सौंदर्य का आनंद लेते रहे ।आखिरकार समय की सीमा ने हमे ना चाहते हुए भी इस स्थान को छोड़ने और आगे बढ़ने को मजबूर किया ।

     

    कुछ और दूर चलने के बाद अचानक ये सारा वातावरण एकदम बदल गया ।शांति के स्थान पर सैकड़ों यात्रियों ,उनके वाहनों और आश्रम से आधेकिलो मीटर पहले शुरू हुए साधारण ,पूजन,खिलौनो की सामग्रियों से भरे बाजार ने हमे पुनः एक कृत्रिम दुनिया में ला खड़ा किया ।सामने हो बोर्ड लगा था “” सती anusiya आश्रम “” ।इसी के पास एक बेरियर लगा था जिसके आगे वहां से पैदल ही जा सकते थे ।

     

    हम अब पैदल ही आश्रम की ओर बढ़ चले ,तब तक मौसम भी कुछ अनुकूल होने लगा था । यहां ये बात भी उल्लेखनीय है कि बीस वर्ष पहले जब में पहली बार यहां आया था तो कोई बाजार ,दुकान कुछ भी नही था।केवल एक छोटा सा माता अनुसिया का आश्रम ,जिसमे दो चार साधु सीधे सरल ढंग से पूजा साधना में लगे रहते थे ।

     

    आश्रम के अंदर एक ओर माता अनुसूया की बड़ी सी साधारण मूर्ति ,और उनके गोद में बैठे त्रिदेवों की छोटी छोटी मूर्तियां ,पास बहती ,पारदर्शी ,निर्मल जल बाली मंडाकणी नदी ,चारों ओर घने वन ,एक अलौकिक वातावरण का निर्माण कर ते थे ,जिसकी स्मृति ने ही मुझे पुनः यहां आने को विवश किया था । ,परंतु ये क्या ! अब तो समय की चाल से सब कुछ बदल चुका था ।नदी एक दम सुखी सी ,पतली सी ,वो छोटा सा आश्रम एक बहुत ही बड़े ,दूर तक ,कई मंजिलों में फैले आश्रम में बदल चुका था।

     

    यात्रियों की रेलमपेल ,खाने पीने वालों की दुकानें ,भिकारियों की बहुलता मन में बेहद खिन्नता भर रही थी।उस पर जब हम आश्रम के अंदर गए तो पुराने आश्रम ,उसकी पुरानी मूर्तियों का तो जैसे कोई चिन्ह भी नही दिखाई दे रहा था ,उनके स्थान पर आधुनिक ,बिजली की झालरों से सजी ,अनेक प्रकार के देवी देवताओं की मूर्तियां ,जिनका पहले कोई यहां अस्तित्व ही नहीं था , और प्रत्येक मूर्ति के आगे बैठे साधुओं के , जो साधु कम व्यवसायिक पुजारी ही लग रहे थे ,जो निहायत ही बेशर्मी से हर आगंतुक से चढ़ाने के लिए पैसों की मांग कर रहे थे।

     

     

    एक बात और मुझे खली ,इन बीते वर्षों में दिवंगत हुए अनेकों साधुओं के समाधि स्थल के रूप में बने छोटे छोटे चबूतरे जो उनकी फोटो सहित सजे हुए थे ,जिनके आगे भी पुजारी बैठे हुए थे जो हर आने वाले से कह कर पैसे मांग रहे थे।

     

     

    साथ ही एक बात और ने मन को शोभ से भर दिया वो यह की सौ फुट तक लंबे इस गलियारे में एक बार आपने प्रवेश कर लिया तो फिर वापस जाना मना था । बस आगे बढ़ते रहिए , हर मूर्ति ,उसके सामने बैठे पुजारी की मांग पूरी करते रहिए तभी आप ,अंत में बाहर जा सकते थे।

       अब श्रद्धा के हाथों मजबूर हम सब चुपचाप बाहर आए ,मूक बन , कार में बैठे , और अपने आश्रम के कमरे की ओर बढ़ चले !  

     

      ( शेष …अगले पोस्ट में )

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    1. बहुत ही विस्तारित तरीके से लिखा है. पड़ के लगा जैसे में ही घूम के आया हूं। शुक्रिया

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